भगवान श्रीराम की बाललीला : धर्म, मर्यादा एवं धैर्य की बेमिसाल मिसाल।
कथावाचक : मानस मयूरी शालिनी तिवारी।
स्थान : विघ्न हरण हनुमत धाम मंदिर परिसर, हसौली, जमालपुर (मीरजापुर)
सात दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा की चतुर्थ संध्या रविवार को श्रद्धा और भक्ति के अनुपम संगम की साक्षी बनी। मानस मयूरी शालिनी तिवारी ने जैसे ही श्रीराम की बाल लीलाओं का वर्णन आरम्भ किया, पूरा पंडाल राममय हो उठा। ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम की स्वर लहरियों के बीच श्रोता भाव-विभोर होकर झूम उठे।
शालिनी तिवारी ने कहा कि प्रभु श्रीराम का अवतार ही धर्म की स्थापना के लिए हुआ था। उनका बचपन सामान्य बालकों जैसा नहीं था। प्रत्येक लीला में मर्यादा, करुणा और धैर्य का ऐसा अद्भुत समन्वय था जिसने राजा दशरथ से लेकर अयोध्या की प्रजा तक सभी का हृदय जीत लिया।
उन्होंने वर्णन किया कि कैसे नन्हे राम अपने भाइयों के साथ महल के आँगन में खेलते-खेलते भी गुरु वशिष्ठ का आदर करना नहीं भूलते थे। माता कौशल्या जब कलेवा करातीं तो पहले गुरु, माता-पिता और फिर भाइयों को खिलाकर स्वयं ग्रहण करते। यह लीला हमें सिखाती है कि धर्म सबसे पहले परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य से शुरू होता है।
बाल राम का धैर्य भी बेमिसाल था। एक बार खेलते समय गेंद सरयू में गिर गई। साथी बालक रोने लगे, पर राम मुस्कुराए और धैर्य से बोले — “जो सरयू में गया, वह राम के काम आएगा।” यह सुनकर सभी शांत हो गए। यह प्रसंग बताता है कि विषम परिस्थिति में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए।
शालिनी जी ने कहा कि आज का युवा यदि राम की बाल लीलाओं से मर्यादा सीख ले तो समाज से विकार स्वतः दूर हो जाएंगे। श्रीराम चरित मानस केवल कथा नहीं, जीवन जीने की राह है। राम का नाम ही मन के कलुष को धो देता है।
कथा के दौरान पंडाल में उपस्थित हर श्रोता की आंखें सजल थीं। “राम सिया राम, सिया राम जय जय राम” के जयकारों से पूरा हसौली गूंज उठा। कथावाचक ने बताया कि राम की बाल लीलाएं हमें तीन सूत्र देती हैं — धर्म के पथ पर चलना, मर्यादा में रहना और हर परिस्थिति में धैर्य रखना।
उन्होंने कहा कि श्रीराम ने कभी जिद नहीं की, कभी अनुचित हठ नहीं किया। माता कैकेयी के कहने पर भी मुस्कुराकर वन जाना स्वीकार किया। इस धैर्य की नींव बचपन में ही पड़ गई थी। जब गुरु विश्वामित्र यज्ञ रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को मांगने आए, तो दशरथ व्याकुल हो उठे। लेकिन बालक राम ने पिता को धैर्य बंधाया और सहर्ष ऋषि के साथ चल दिए। यही मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श है।
कथा श्रवण का महत्व बताते हुए शालिनी तिवारी ने कहा कि श्रीराम कथा सुनने मात्र से मनुष्य के काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकार दूर होते हैं। यह कथा आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सेतु है।
इस पावन अवसर पर अंकित सिंह पटेल, रविप्रकाश तिवारी, लालता प्रसाद बियार, ग्राम प्रधान दिनेश बियार, प्रधान बिहारी बियार, अमरनाथ पांडेय, गौरीशंकर सिंह, बबलू चौबे, आशीष द्विवेदी, मृत्युंजय पांडेय, अंजनी नंदन चतुर्वेदी, भगवान दास पांडेय, राहुल दुबे, अभिनव द्विवेदी सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीश द्विवेदी रंजन ने किया।
कथा के समापन पर महाआरती हुई और प्रसाद वितरण किया गया। श्रोताओं ने संकल्प लिया कि वे राम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे।
*जय श्रीराम*









