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जीवन सार, विधुर न हों  राम राम साहब्, आलेख शंकर देव तिवारी

आज की बात

 

जीवन सार, विधुर न हों

राम राम साहब्

मिलने की ललक और बोल बतियाने के लिए ऐसे भीषण तम ताप मान मेंलखनऊ से चलकर पंहुन्चै अंतरराष्ट्रीय खिलाडी ने कहा आप को आना है। फिर थोड़ी देरबादबाह् के खेल पुरोहित का फोन आया बस फिर क्या था कौन ध्यान देता भीषण गर्मी पर। कर्नल मित्र ने कहा तीन बजे नहीं दो बजे आइये जिससे दो घंटे हम लोग साठ से ऊपर बाॅलों की संगति का आंनद लेंगे।इंतजार शुरू होगया आज २२जून का। सुवह एक नये अखबार में जाब की बात करने गया तो पोने दो बजे उक्त कार्यालय से आया घर मगर भोजन मन का न बना होने से खेल पुरोहित के घर की ओर का सफर शुरू हुआ। पोने तीन बजे एक जगह पाव भाजी से छुदा शांत कर खेल पुरोहित केसाथ कर्नल को ले एक बहु मंजिल भवन जा पंहुन्चै।आगरा से हम सभी बोलते बतियाते कब खेल संगम स्थल प्नहुँचे पता नहीं चला। वहाँ एक और पूर्व फौजी से मिले। जिनका स्वागत सत्कार जय हिंद राम राम के साथ हुआ। वे नये नये विधुर हुए थे मगर बहुत अच्छे कोच भी एथलेटिक के रहे थे। जीवन सार यात्रा सार भोजन से पहले हुई इन दोनों के मध्य हुई वातायन से मिला वह सो तीर्थों के करने के बाद भी नहीं मिलता। विधुर होना सबसे बड़ा दुःखद अनुभव संग बांट रहे थे जब वे तब हम भी सोच रहे थे कि कल कहीं……

 

आमन्त्रन करने बाले बन्धु के पुरखों के साथ अनुज अर्जुन के साथ पिता को भी नमन किया गया। हम आज उनके चचा के निधन पर शांति हवन में मिलने का मन बना प्नहुँचे थे। इसी समय खेल जगत के दर्जन भर जूनियर साथीहमारे बीच आ गए। जिनमें नेशनल, विवि , स्तर खेले मित्र और साथ आ मिले। हवन और शांति पाठ में हम सभी शामिल हुए।

१९९८ के बाद अब मिले एक से यादें ताजा हुईं। शांति भोज से लौटते समय हम सभी अर्जुन की लाट पर खेड़े हो फोटो शेषन भी चला। जिसके लिए शुरुआत मैने ही की यह कह कर कि आओ (अर्जुन अवार्ड्डी अजित के बड़े भाई अजय जी से अनुरोध किया ) नमन करलें अजित को….

इस घर की चौथी पीढी अपना परचम खेल में आज फहरा रही है को हम लोग लौटते समय भी सन्समरणों से नमन करते रहे……

एक एक कर मिल जो कारवां बना वैसे ही एक एक कर अपने अपने भेलों में छूटते गए….

अगली मुलाकातों की आशाएं सेहते हुए सभी साठ के ऊपर थे और खिलाडी थे

जय भोले की

जीवन सार विधुर न हों कभी बुढापे में?!

 

शंकर देव तिवारी आगार से क्वारी गाँव का महासफर

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