सरकारी ज़मीन पर ‘भूमाफिया मॉडल’! शीतला माता मंदिर की पावन भूमि पर कथित कब्जे की साज़िश, राजस्व सीमांकन उखाड़कर अवैध प्लाटिंग का खेल—क्या माफियाओं के आगे बेबस है प्रशासन?

*सरकारी ज़मीन पर ‘भूमाफिया मॉडल’! शीतला माता मंदिर की पावन भूमि पर कथित कब्जे की साज़िश, राजस्व सीमांकन उखाड़कर अवैध प्लाटिंग का खेल—क्या माफियाओं के आगे बेबस है प्रशासन?*

 

*तुर्रम सिंह राजपूत✍️*

 

जलेसर (एटा), 2 जुलाई 2026। तहसील जलेसर के राजस्व ग्राम इसौली में सरकारी भूमि को लेकर उठे गंभीर आरोपों ने राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली और सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी खाते में दर्ज गाटा संख्या 1215, 1216 की भूमि, जहां वर्षों पुराना शीतला माता मंदिर स्थित है और प्रतिवर्ष विशाल धार्मिक मेला आयोजित होता है, उसे सुनियोजित तरीके से अवैध प्लाटिंग के माध्यम से हड़पने का प्रयास किया जा रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार 29 जून 2026 को राजस्व विभाग की टीम ने गाटा संख्या 1215 एवं 1216 की विधिवत पैमाइश कर सीमांकन कराया था। लेखपाल, कानूनगो और ग्राम प्रधान की उपस्थिति में सरकारी सीमा चिन्ह स्थापित किए गए थे। लेकिन आरोप है कि महज़ तीन दिन बाद, 2 जुलाई को इन सीमांकन चिन्हों को तोड़ दिया गया। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का मामला नहीं, बल्कि राजस्व विभाग की आधिकारिक कार्रवाई को चुनौती देने जैसा गंभीर प्रकरण भी हो सकता है।

ग्रामीणों का दावा है कि समीपवर्ती गाटा संख्या 1217 पर प्लाटिंग करने वाले कुछ लोगों द्वारा खरीदारों को सरकारी गाटा संख्या 1215, 1216 से रास्ता दिखाया जा रहा है। आरोप है कि सीमांकन के पत्थर हटाकर और मिट्टी के टीले बनाकर सरकारी भूमि की वास्तविक सीमा धुंधली करने की कोशिश की गई, ताकि बाद में कब्जे का विवाद खड़ा किया जा सके।

उद्राण खतौनी के अनुसार गाटा संख्या 1215, 1216 सरकारी खाते में दर्ज बताई जा रही है। ऐसे में यदि सरकारी भूमि पर अवैध प्लाटिंग या अतिक्रमण के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सरकारी संपत्ति की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस भूमि पर धार्मिक आयोजन होते हैं, उसी भूमि पर कब्जे के प्रयास स्थानीय लोगों की धार्मिक भावनाओं को भी आहत करते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि राजस्व विभाग ने सीमांकन कराया था, तो सरकारी चिन्ह आखिर किसके संरक्षण में थे? यदि उन्हें वास्तव में क्षतिग्रस्त किया गया, तो अब तक जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई? क्या सरकारी भूमि की सुरक्षा केवल कागज़ों तक सीमित है, या जमीन पर भी उसका अस्तित्व बचाया जाएगा?

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, सरकारी भूमि का पुनः स्थायी सीमांकन कराया जाए, चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं, कथित अवैध प्लाटिंग पर तत्काल रोक लगे तथा यदि जांच में आरोप सत्य पाए जाएं तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाए।

अब निगाहें प्रशासन पर हैं। यदि सरकारी भूमि पर कब्जे और सीमांकन तोड़े जाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह केवल एक गांव की भूमि का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

 

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