जरा पहचानिये इन्हें बचपन में तीर बनाकर धनुष युद्ध करते थे
याद है न या भूल गए आप सब ? ये है आज कल बिकने वाली सबसे मंहगी सब्जी, इनके फूलों की बेहद लज़ीज़ सब्जी बनती है इस समय यह दो सौ रूपये किलो तक बिक रहे है बाजारों में।
👇चलिये हम बताते हैं इसका नाम है सनई, कभी इसका जलवा था। आज से दो दशक पहले तक यह पौधा धनघटा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को ताकत देता था। तब जिनके पास सिंचाई की सुविधा होती थी वे सनई की तीन तीन फसल लेते थे। इसके पौधों में फूल आते ही सबसे पहले तो फूल सुरुकने वाली महिलाओं की भीड़ खेतों में नजर आती थी। और घर लाते ही कच्चे मसाले में इसे बनाकर इसके स्वाद के भरपूर आनंद उठाएं जाते थे मेरे बाबा दादी हरी मिर्च और लहसुन के तड़के के साथ इन फूलों का साग बेहद पसंद करते थे और आज भी हम सनई को इसी स्वाद के साथ बनाते है।
हमारे छेत्र में कुछ किसान भाई सनई को आज भी स्वाद के लिए उगाते है और इसी कारण से सनई आस पास के बजारों में भी उपलब्ध हो जाती है।
और फिर शुरू होती थी सनई की कटाई। इसका ऊपरी हिस्सा काट कर बाकी हिस्से को पानी में डाल कर एक हफ्ते के लिये सड़ाया जाता था। जब सनई सड़ जाती थी तो उसी पानी में पटक पटक कर सनई धोई जाती थी। धुलाई के बाद सनई के डंठलों का हरा रंग और तमाम पत्तियां साफ हो जाती थीं और दिखने लगती थी सनई की सफेद रेशों की ढेर सारी कतारें। धुलाई के बाद सनई वहीं खड़ी कर दी जाती थी और फिर सूख जाने के बाद धुली सनई घर लाई जाती थी और उससे सनई के रेशे अलग किये जाते थे। बाकी सफेद और सीधी नरम डंठल जिसको सरफुलाई कहते थे, अलग करके सुखाई जाती थी और ठंड में इसको चूल्हे में जलाकर इससे सरया, सोकना, रानीकजरा जैसे धान की भुजिया होती थी और इसी के डंठल को जलाकर भूंज लिया जाता था मकई का भूंजा।
हम लोग बचपन में इस सरफुलाई का तीर बना कर धनुष युद्ध करते थे। सनई के रेशों से सबसे ज्यादा बनती थी बाधी जिससे खटिया बुनी जाती थी। ये अच्छे भाव से बिकती थी और बंडा बाजार की सुतली बनारस तक जाती थी। इसको हाथ से बर कर पगहा बनता था जिसमें गाय, भैंस और बैल बांधे जाते थे। यह पगहा भीगने पर भी सड़ता नहीं था। लेकिन अब सनई की बुआई बहुत कम होती है। जो बोते हैं वे फूल के लिये ही बोते हैं। अब तो इसका बीज भी बड़ी मुश्किल से मिलता है।
क्या आप की तरफ यह बाजारों में उपलब्ध है??
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साभार
Jaya Saxena









