हम पत्रकार करें तो करें क्या?
एक सवाल मन में आता है कि आखिर हमारे अखबार या नियमित चैनल हमारे पत्रकार संगठनों की गतिविधियों से क्यों दूरी बना कर चलते हैं जो खुद के संस्थानों तक के कलम गार अपनी ख़बर नहीं लगवा पाते। जिनकी एक ख़बर से दिल्ली तक हिल जाती है। केसी विपुल समस्या है उनमें से एक मैं भी हूँ मगर कोशिशे जारी है जो कि सफलता तक जारी रहेगी।
अभी पिछले दिनों एक पत्रकार के लड़के को मारा पीटा गया। उसकी ख़बर नहीं लगी। मगर एक पत्रकार को पकड़कर ले जाने वाली पुलिस कार्र्वाई को गुड वर्क बनाकर बढ़ चढकर प्रकाशित सभी मुख्य अखबारों ने किया।
एक भी आयोजन समायोजन स्थान नहीं ले पाते हमारे ये कलमगार और उनके संगठन। इस विषय पर मैने कोशिश की तो पता चला ये कोई कमी छोटी नहीं बड़ी समन्वय न बननेकी बड़ी बात है।
इसी उधेड़बुन में मैं था कि एक क्लब तक की खबरों को भी तब स्थान मिला जब उसे सम कालीन आधिकारी बुलाने पड़े। तो हम क्या माने अफसर शाही हम अखबार बालों पर भी अपना घुन लगा चुकी है।
अभी हम एक अखिल भारतीय पत्रकार संस्था के आयोजन की दो ख़बर इन अखबारों मे नहीं देख पा रहा हूँ जो जन हित और लोक कल्याण के कामों का संमावेश था । स्वास्थ्य और कवि जैसे शब्दों के आयोजन भी ख़बर नहीं बने?
इनकी नजर में हम घास कूड़ा हैं या खर पत्वार जो ताकत तो हैं मगर खुद के लिए नहीं। घर को जोगी जोगना आन गाँव का सिद्ध……
एक परिवर्तन
आज की शिक्षा का प्रचार प्रसार ऐसे ही अखबार कैसा प्रसार कर राज्य में लोगों को गेर जिम्मेदारी निभा रहे हैं बाह तहसील के गाँव के बंद कुआँ में गिरे बच्चे को निकालने के लिए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और बच्चा मर गया। ये हमें कर्तव्य दायित्वों से अवगत कराता है।
ये शासन प्रशासन के भर रहने का जो मन बना दिया है से हमें कुछ सोचने को मजबूर होना पड़ रहा ;है









