*37 दिनों में 36 दुर्घटनाएं, 22 मौतें | अपने ही पैसे से मुआवजा लेते मृतक संविदा कर्मी परिवार और खुद की पीठ ठोंकते बड़का बाबू लोग*
लखनऊ, *उत्तर प्रदेश में जब डेढ़ करोड़ उपभोक्ता थे तब प्रत्येक बिजली घर पर 36 कर्मचारी तैनात करने का आदेश था। आज उपभोक्तावादी की संख्या 1.5 करोड़ से बढ़कर 3.5 करोड़ पार कर चुकी है तो कर्मचारियों की संख्या 45 प्रतिशत घटाकर प्रत्येक विद्युत उपकेंद्रों पर 36 से घटाकर 18.5 कर दी गई। मध्यांचल में वर्टिकल व्यवस्था के नाम पर इसे और घटाकर साढ़े 7 कर दिया गया*।
*प्रबंधन की यह “अद्भुत कुशलता” देखकर लगता है — जितने ज्यादा उपभोक्ता, उतने कम कर्मचारी। विकास का नया मॉडल!*
*नतीजा? मात्र 37 दिनों में 36 दुर्घटनाएं और 22 संविदा कर्मियों की मौत। अकुशल कर्मी हाई वोल्टेज लाइनों पर काम कर रहे हैं, कुशल कर्मी 24 घंटे ड्यूटी पर थक रहे हैं, और मौतें लगातार हो रही हैं।*
26 मई 2025 को पावर कॉर्पोरेशन ने 10 लाख रुपये मुआवजे का आदेश जारी किया, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। मृतक संविदा कर्मी अपने ही वेतन से कटे 105 रुपये प्रतिमाह के अंशदान पर निर्भर है। यानी जो मर गया, उसने खुद ही अपनी मौत का बीमा कर रखा था।
*भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का छुपा एजेंडा निजीकरण*
*अध्यक्ष आशीष गोयल और प्रबंध निदेशक रिया केजरीवाल जैसें भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी इन मौतों के मुख्य जिम्मेदार हैं। इनकी अनुभवहीनता, नियम बदलकर चुनिंदा चाटुकार अधिकारियों और निदेशकों को लाने की व्यवस्था, और निजीकरण का छुपा एजेंडा अब साफ दिख रहा है।*
*पहले कुशल संविदा कर्मियों को जबरन हटाओ, फिर चाटुकार अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों से काम करवाओ, जो बिना सोचे-समझे *भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की “हां में हां” मिलाते हैं और उनकी तारीफ में अपनी दुम हिलाते हैं।* *नतीजा लगातार दुर्घटनाएं और मौतें*।
*पिछली बार जब कर्मचारियों ने कार बहिष्कार और हड़ताल की, तो भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने सारी जिम्मेदारी श्रमिक संगठनों और अभियंता संघ पर डाल दी। उनके नेताओं पर करोड़ों रुपये के मुआवजे के केस कर दिए। जो चाटुकार थे, वो बच गए। शेष फंस गए। *अपनी अनुभवहीनता को इस तरह छुपा लिया गया*।
*संविदा कर्मी मरेंगे, परिवार रोएंगे, हड़ताल होगी, बहिष्कार होगा, जनता गर्मी में त्राहि-त्राहि करेगी और अंत में “निजीकरण जरूरी है” कहकर पूरा खेल पूरा कर लिया जाएगा।*
*सबसे मार्मिक सवाल यह है कि*
*क्या मात्र दुर्घटना कहकर अपना पल्ला झाड़ लेना और 10 लाख रुपये मुआवजा दे देना… यही रह गया है?*
*क्या इतने से इतिश्री हो गई?* *क्या दस लाख रुपये में वो परिवार पूरा जीवन निर्वाह कर लेगा, जिसके बाप, पति या बेटा मर गया?*
*क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अपनी किसी प्रियजन की मौत पर सिर्फ दस लाख रुपये का मुआवजा स्वीकार कर लेंगे?*
*यह तानाशाही की हद है। आज तक न ऊर्जा मंत्री, न अध्यक्ष, न प्रबंध निदेशक — किसी की तरफ से एक शोक संदेश तक नहीं आता।*
अब यक्ष प्रश्न यह है कि
क्या इन अधिकारियों पर मानववध का मुकदमा दर्ज करना उचित नहीं होगा ? उनकी अनुभवहीनता, चाटुकारिता और निजीकरण के एजेंडे के कारण न सिर्फ संविदा कर्मी मर रहे हैं, बल्कि पूरा बिजली सिस्टम चरमरा रहा है*।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
*क्या साथियों की मौतों पर शोक सभा करने की भी इजाजत मिलेगी, या उस पर भी तानाशाही होगी?*
*जब उत्तर प्रदेश बिजली उपभोक्ता संख्या में देश में पहले स्थान पर है, तब संविदा कर्मियों की जान की यह कीमत और आम जनता का बिजली संकट बेहद शर्मनाक है*।
*प्रबंधन अगर यही नीति जारी रखेगा तो जल्द ही संविदा कर्मी हड़ताल पर चले जाएंगे, जनता गर्मी में तड़पेगी और बिजली व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाएगी।*
*मानव जीवन किसी भी निजीकरण के एजेंडे या प्रशासनिक महत्वाकांक्षा से कहीं ज्यादा मूल्यवान है। अब समय है जवाबदेही तय करने कि सरकार या उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन की तरफ से क्या मुआवजा मृतक के आश्रितों को दिया जाता है यह तो बीमा राशि है जिसमें कड़ाई संस्था और संविदा कर्मी मिलकर बीमा राशि के प्रीमियम भरते हैं और इसी को क्षतिपूर्ति बात कर मृतकों के परिवार को एक लॉलीपॉप पकड़ा दिया जाता है जबकि एक छोटे से छोटे दुर्घटना होने पर सरकार द्वारा अपना वोट बैंक साधने के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं क्या मृतक संविदा कर्मी उसे श्रेणी में नहीं आते क्या उनका परिवार वोट बैंक नहीं है या सिर्फ वह सेवा करते हुए अपनी बलि देने के लिए ही है आखिर कब सुनवाई होगी अब इन संविदा कर्मियों का हक इनको मिलेगा कब तक ऐसी इसी प्रकार से इनको धोखा दिया जाएगा आखिर कब तक और इसका जिम्मेदार सिर्फ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही नहीं वर्णन इंजीनियर भी है* । खैर
*युद्ध अभी शेष है*
*अविजित आनन्द संपादक और चन्द्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ*









