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एटा मेडिकल कॉलेज: जहां “इलाज” से ज्यादा “इल्जाम” ठीक होते हैं* *प्राचार्य डॉ. बलवीर सिंह के “स्वर्णिम युग” में कॉलेज बना विवादों का वेंटिलेटर, रिपोर्ट अनिल सोलंकी

*एटा मेडिकल कॉलेज: जहां “इलाज” से ज्यादा “इल्जाम” ठीक होते हैं*
*प्राचार्य डॉ. बलवीर सिंह के “स्वर्णिम युग” में कॉलेज बना विवादों का वेंटिलेटर*

भाई साहब, एटा में एक मेडिकल कॉलेज है। नाम है वीरांगना अवंतीबाई लोधी मेडिकल कॉलेज। नाम सुनते ही लगता है यहां वीरता से इलाज होगा। पर जब से डॉ. बलवीर सिंह जी ने प्राचार्य की कुर्सी गर्म की है, तब से यहां वीरता नहीं, “वीवीआईपीगिरी” और “गलतफहमी” का इलाज चल रहा है।

*कांड-पुराण का पहला अध्याय: “पत्रकार-लीला”*
अप्रैल का महीना था। डॉक्टर और पत्रकारों में “विचारों का आदान-प्रदान” हुआ। पत्रकारों ने FIR की गंगा बहा दी। फिर दस दिन बाद अस्पताल की एक नर्स मैडम को अचानक “मेमोरी लॉस” से “मेमोरी प्लस” हो गया। कोर्ट पहुंचीं और बोलीं- “साहब, मेरे कपड़े भी फटे थे।”
अब सवाल ये है कि दस दिन तक मैडम दर्जी का इंतजार कर रही थीं या स्क्रिप्ट राइटर का? घटना के दिन प्राचार्य जी, सीएमएस साहब, कैमरा, लाइट, एक्शन सब मौजूद था। पर किसी को फटे कपड़े नहीं दिखे। मतलब ये “ब्रह्मास्त्र” दस दिन बाद लॉन्च हुआ। इसे कहते हैं “देर आए दुरुस्त आए, पर केस करके आए”।

*दूसरा अध्याय: “मातृ-सेवा महायज्ञ”*
फिर प्राचार्य जी की माताजी की तबीयत नासाज हुई। बस फिर क्या था, पूरा अस्पताल “श्रवण कुमार” बन गया। हर दो घंटे में नर्स बदलो, वार्डबॉय बदलो, डॉक्टर बदलो। ड्यूटी चार्ट ऐसा बना जैसे IPL की प्लेइंग-11 हो। वो चार्ट वायरल हुआ तो जनता बोली- “साहब, हमें भी अपनी मां मान लो। कम से कम पर्ची तो दो मिनट में बन जाएगी।”
आम आदमी ओपीडी की लाइन में खड़ा-खड़ा “हे राम” जप रहा है, और यहां माताजी के कमरे के बाहर स्टाफ की लाइन लगी है। इसे कहते हैं “मां की सेवा में मेवा, और जनता जाए भाड़ में”।

*तीसरा अध्याय: “गलतफहमी का इंजेक्शन”*
अब आया सबसे ताजा ब्लॉकबस्टर। 15 साल की बच्ची दांत दिखाने आई। डॉक्टर साहब ने नशे का इंजेक्शन लगाया और कहा- “बेटा रिलैक्स करो”। बच्ची रिलैक्स हुई तो डॉक्टर साहब का “संस्कारी हाथ” रिलैक्स होकर सीधे बच्ची के सीने पर पहुंच गया। होश आते ही बच्ची भागी।
पिता शिकायत लेकर पहुंचे तो प्राचार्य जी ने “ज्ञान की गंगा” बहा दी- “अरे, बच्ची को समझ कम है, गलतफहमी हो गई।”
मतलब सरकार करोड़ों खर्च करके स्कूल में गुड टच-बैड टच का पाठ पढ़ा रही है, और यहां प्राचार्य साहब कह रहे हैं कि नौवीं की लड़की को टच का मतलब नहीं पता। वाह! डॉक्टर का इंटेंशन तो “गंगोत्री” से निकला है, सारी गलती बच्ची की “नासमझी” की है।
सीएमएस साहब तो एक कदम और आगे निकले। बोले- “हो सकता है धोखे से हाथ लग गया हो।” साहब, धोखे से चाय का कप गिरता है, किसी की अस्मत पर हाथ नहीं गिरता।

*क्लाइमेक्स: “जांच कमेटी का झुनझुना”*
हर कांड के बाद प्राचार्य जी का रिकॉर्डेड मैसेज बजता है- “जांच कमेटी बैठा दी है, दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।”
अरे साहब, इतनी कमेटियां बैठा दीं कि अब तो कॉलेज में मरीजों से ज्यादा कुर्सियां कमेटी वालों के लिए लगी हैं। रिपोर्ट कब आएगी? जब अगला कांड होगा, तब। इसे कहते हैं “जांच पर जांच, कांड पर कांड”।

*जनता पूछे है:*
1. पत्रकारों के कपड़े फाड़ने का इल्जाम दस दिन बाद क्यों याद आया? पहले शूटिंग चल रही थी क्या?
2. माताजी के लिए दो घंटे में नया स्टाफ, और जनता के लिए दो दिन में भी डॉक्टर नहीं। ये कौन सा “मां-बेटे” का संविधान है?
3. 15 साल की बच्ची को “गलतफहमी” है, तो आपके डॉक्टर को “हया” कब आएगी?

एटा मेडिकल कॉलेज अब अस्पताल नहीं, “कंट्रोवर्सी का हब” बन गया है। यहां बुखार की टेबलेट मिले न मिले, हर हफ्ते एक नया बवाल जरूर मिलता है। मिशन शक्ति के पोस्टर दीवार पर टंगे हैं, और अंदर “मिशन अय्याशी” चल रहा है।

प्राचार्य जी, आप कुर्सी पर बैठे हो या “कौन बनेगा करोड़पति” की हॉट सीट पर? क्योंकि यहां हर सवाल का एक ही जवाब है- “जांच कमेटी लॉक कर दी जाए”।

*नोट:* उपरोक्त सभी घटनाएं अखबारों और शिकायतों में दर्ज हैं। अगर इसे भी आप “गलतफहमी” बताएंगे, तो अगली बार हम “सही-फहमी” वाला कैमरा लेकर आएंगे। क्योंकि जनता की अदालत में तारीख नहीं, सीधा इंसाफ होता है।

रिपोर्ट :- राजीव मिश्रा
मो न :- 8279327498

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