महामानव बुद्ध की धम्म-क्रांति: आधुनिक भारत और लोकतंत्र का वैशाली मॉडल

*महामानव बुद्ध की धम्म-क्रांति: आधुनिक भारत और लोकतंत्र का वैशाली मॉडल*

*तथागत गौतम बुद्ध का नागरिक पत्रकारिता*

 

— एके बिंदुसार (संस्थापक: भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल )कोर कमेटी एवं मुख्य संयोजक- इंटरनेशनल मीडिया आर्मी)

आधुनिक भारत जब अपनी लोकतांत्रिक जड़ों को तलाशता है, तो उसकी यात्रा लुटियंस दिल्ली की दीवारों से नहीं, बल्कि ढाई हजार साल पहले वैशाली के ‘संथागारों’ से शुरू होती है। महामानव तथागत बुद्ध केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे विश्व के पहले महान लोकतांत्रिक क्रांतिकारी थे, जिन्होंने समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की नींव रखी।

वर्तमान समय में बौद्ध धम्म की उपयोगिता: एक वैश्विक समाधान,

आज का समाज जब जातिवाद, सांप्रदायिकता और मानसिक तनाव की आग में झुलस रहा है, तब बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ ही एकमात्र विकल्प दिखाई देता है।

मानसिक शांति और प्रज्ञा: भागदौड़ भरी जिंदगी में ‘विपश्यना’ और ‘सजगता’ (Mindfulness) आज वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य हैं।

सामाजिक न्याय: बुद्ध ने ‘जाति’ को नकार कर ‘कर्म’ और ‘चरित्र’ को प्राथमिकता दी। आधुनिक भारत के संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने बुद्ध के इसी धम्म को आधुनिक भारत की नैतिक रीढ़ बनाया।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: बुद्ध का धम्म अंधविश्वास पर नहीं, बल्कि ‘अप्प दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो) के तर्कसंगत मार्ग पर टिका है।

नागरिक पत्रकारिता (Citizen Journalism) और वैशाली की क्रांति,

वैशाली केवल एक नगर नहीं था, वह एक विचार था। तथागत बुद्ध ने वैशाली के ‘लिच्छवि गणराज्य’ की जिस शासन पद्धति की प्रशंसा की, वही आज की नागरिक पत्रकारिता का मूल आधार है।

वैशाली क्रांति का महत्व:

सूचना का विकेंद्रीकरण: वैशाली में निर्णय बंद कमरों में नहीं, बल्कि जन-सभाओं (संथागार) में होते थे। नागरिक पत्रकारिता का मूल मंत्र भी यही है—सूचना पर किसी खास वर्ग का एकाधिकार न होकर आम नागरिक की भागीदारी हो।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: बुद्ध ने वैशाली के गणराज्यों को ‘अपरिहाणीय धर्म’ (विनाश न होने वाले नियम) सिखाए थे, जिनमें प्रमुख था—’मिलकर बैठना, मिलकर चर्चा करना और मिलकर निर्णय लेना।’ यही संवाद की संस्कृति आज की स्वतंत्र मीडिया की आत्मा है।

सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस: वैशाली की क्रांति ने सिखाया कि व्यवस्था तब तक जीवित है जब तक नागरिक जागरूक हैं। नागरिक पत्रकारिता इसी ‘जन-जागरूकता’ का आधुनिक विस्तार है।

भारतीय मीडिया फाउंडेशन( नेशनल )और इंटरनेशनल मीडिया आर्मी का संकल्प,

एक पत्रकार के रूप में हमारा दायित्व केवल सूचना देना नहीं, बल्कि तथागत बुद्ध के ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के सिद्धांत को धरातल पर उतारना है। भारतीय मीडिया फाउंडेशन और इंटरनेशनल मीडिया आर्मी इसी वैशाली मॉडल को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं, जहाँ:

अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बुलंद हो।

पत्रकारिता कॉरपोरेट का गुलाम न होकर ‘लोकतंत्र का प्रहरी’ बनी रहे।

सत्य, करुणा और न्याय के साथ सूचना का प्रवाह हो।

 

महामानव बुद्ध का विचार आधुनिक भारत के लिए केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य का मार्ग है। यदि हमें एक सशक्त, समृद्ध और समतावादी भारत बनाना है, तो हमें वैशाली की उस लोकतांत्रिक चेतना को फिर से जगाना होगा। नागरिक पत्रकारिता के माध्यम से हर व्यक्ति को ‘बुद्ध’ बनना होगा—सत्य के प्रति अडिग और अन्याय के प्रति मुखर।

सत्य ही धम्म है, और धम्म ही विजय है।

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