चंबल अब अपना इतिहास खुद लिखेगा: ‘1857 के क्रांतिवीरों को न्याय दो’ अभियान को मिल रहा जनसमर्थन, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

चंबल अब अपना इतिहास खुद लिखेगा: ‘1857 के क्रांतिवीरों को न्याय दो’ अभियान को मिल रहा जनसमर्थन

 

औरैया: चंबल अंचल के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के रणबांकुरों की कीर्ति रक्षा और उन्हें इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिलाने के उद्देश्य से चल रहा “चंबल मिशन” अभियान लगातार जनसमर्थन जुटा रहा है। सोमवार को यह अभियान औरैया जनपद के हजारीपुर, गिरधारीपुर, रसूलपुर, प्रतापपुर और हजरतपुर आदि गांवों में पहुंचा, जहां 1857 के क्रांतिवीरों की स्मृति में जनचौपाल आयोजित की गई। जनचौपालों में ग्रामीणों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया और “1857 के क्रांतिवीरों को न्याय दो” की मांग का समर्थन किया।

 

अभियान के दौरान जीता चमार, जंगली-मंगली मेहतर और मारून सिंह लोधी जैसे उपेक्षित क्रांतिनायकों के संघर्ष और बलिदान को याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि हजारों वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपने प्राण न्यौछावर किए, लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें “बागी” और “क्रिमिनल” घोषित कर इतिहास के पन्नों में दबा दिया। आज भी चंबल क्षेत्र को केवल “डकैत क्षेत्र” के रूप में पहचान मिलना इन शहीदों का अपमान है।

 

चंबल फाउंडेशन परिवार द्वारा संचालित इस अभियान के तहत गांव-गांव जाकर जनचौपालों के माध्यम से लोगों को चंबल अंचल की गौरवशाली विरासत और स्वतंत्रता संग्राम में उसके योगदान से परिचित कराया जा रहा है। अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि अब चंबल अपना इतिहास खुद लिखेगा और गुमनाम क्रांतिवीरों को उनका उचित सम्मान दिलाकर रहेगा।

 

अभियान के दौरान “चंबल शौर्य स्मारक” और “चंबल विश्वविद्यालय” की मांग को भी व्यापक समर्थन मिल रहा है। प्रस्तावित स्मारक में क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं, पुस्तकालय, ऑडिटोरियम, लाइट एंड साउंड शो, ‘चंबल गाथा’ डॉक्यूमेंट्री तथा डाक टिकट जारी करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। साथ ही इन वीरों के जीवन और योगदान को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग भी प्रमुखता से उठाई जा रही है।

 

चंबल-यमुना दोआब क्षेत्र में आगामी 31 मई 2026 को प्रातः 10 बजे चकरनगर की राजगढ़ी में “चंबल शौर्य दिवस” का ऐतिहासिक आयोजन किया जाएगा। आयोजन की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान चंबल मिशन की आगामी रणनीति और आंदोलन की दिशा भी तय की जाएगी।

 

अभियान से जुड़े लोगों ने बताया कि 31 मई 1857 को चकरनगर रियासत के राजा कुशलपाल सिंह चौहान और कुंवर निरंजन सिंह चौहान ने दोआब क्षेत्र को स्वतंत्र घोषित कर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। इसके बाद पूरा चंबल अंचल जनक्रांति में बदल गया और अंग्रेजी सत्ता को बीहड़ों के हर मोर्चे पर कड़ी चुनौती मिली।

 

जनचौपालों में जंगली-मंगली मेहतर को दलित शौर्य का अमर प्रतीक बताया गया, जिन्होंने चकरनगर को केंद्र बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ कई युद्ध लड़े। वहीं बंसरी गांव के जीता चमार को पंचनद क्षेत्र का अडिग योद्धा बताया गया, जिन्होंने अंग्रेजों के आत्मसमर्पण के प्रस्ताव को ठुकराकर अंतिम समय तक संघर्ष किया। मारून सिंह लोधी को चंबल का निर्भीक क्रांतिनायक बताते हुए कहा गया कि ब्रिटिश अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने उन्हें “नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविन्स का सबसे खतरनाक व्यक्ति” तक कहा था।

 

अभियान के अंतर्गत चौरेला, हुकुमपुरा, बेनीपुरा, बंसरी, रौरा का पुरा, लुहिया खुर्द, बहादुरपुर लोहिया, शेरगढ़, पिपरौली गढ़िया, कचौरा घाट, खितौरा सहित कई गांवों में जनसंपर्क और जनचौपाल कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। साथ ही हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है, जिसमें ग्रामीणों और युवाओं का उत्साह देखने को मिल रहा है।

 

अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि स्वतंत्र भारत में चंबल के इन क्रांतिवीरों का ईमानदार पुनर्मूल्यांकन नहीं हुआ। उनका मानना है कि चंबल की पहचान केवल बीहड़ या अपराध नहीं, बल्कि विद्रोह, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली परंपरा रही है।

Leave a Comment