पार्थ सारथी मंच द्वारा मनायी गयी भगवान नेमीनाथ की जयंती।
एटा /जैन धर्म के बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की जयंती पर पार्थ सारथी मंच एटा द्वारा एक संगोष्ठी एवं काव्य संध्या का आयोजन किया गया। प्रथम सत्र में वक्ताओं विजय जैन विज्जी, विमल जैन हिप्पोलिन, बबिता जैन, पूर्व प्राचार्य महावीर सिंह, समाज सेवी वेदप्रकाश टिन्नी, बसंत यादव पत्रकार नीतेश यादव ने भगवान नेमीनाथ के त्याग वैराग्य व साधना पर विस्तार से विचार प्रकट किए।
उन्होंने बताया कि राजकुमार नेमि कुमार का जन्म पिता समुद्र विजय और माता रानी शिवा कुमारी के घर शौरीपुर में हुआ था. वह भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे. भगवान कृष्ण नेमिकुमार के दयालु अहिंसक और करुणामई स्वभाव को पहचानते थे इसलिए कृष्ण चाहते थे कि नेमिकुमार में वैराग्य पैदा हो ताकि वह जैन धर्म में जाकर जीव मात्र के कल्याण हेतु कार्य कर सकें. जब कुमार नेमि की बारात जूनागढ़ जा रही थी तो नगर से बाहर मार्ग के समीप पशुओं का बाड़ा बनाया गया जिसमें भूखे प्यासे पशु बांध दिए गए. कुमार नेमि रथ में बैठे समीप से गुजरे तो पशुओं का भूख से व्याकुल क्रन्दन सुनाई दिया. उन्होंने साथ चल रहे रक्षकों से इसके बारे में पूछा तो कृष्ण द्वारा शिक्षित रक्षक ने बताया राजकुमार ये पशु बरातियों के भोजन हेतु बंधे हैं। इन्हें काट कर मांस पकाया जाएगा जो बारात को परोसा जाएगा. जीव हत्या की बात सुनकर कुमार नेमि को वैराग्य पैदा हो गया और वह जैन धर्म में सम्मिलित हो गए. जूनागढ़ के पास गिरिनार पर्वत पर उन्होंने घोर तपस्या की यहीं उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुईं. इस तरह वह जैन धर्म के बाइसवें तीर्थंकर बने. उनकी पत्नी रजुला ने भी
जैन धर्म की दीक्षा ले कर पति के साथ चलने का संकल्प ले कर जैन धर्म को समृद्ध किया।
कार्यक्रम के दूसरे चरण में काव्य गोष्ठी संपन्न हुईं जिसमें भगवान नेमिनाथ को काव्य के माध्यम से याद किया गया। कवि एवं लोकगीतकार राकेश कुमार ने पढ़ा –
नेमीनाथ भगवान आपकी जय जय जय।
समुद्र विजय पिता तुम्हारे
माँ शिवा देवी के प्यारे
कृपालू कृपा निधान तुम्हारी जय जय जय।
कवि मुरारी लाल मानव ने अपना छंद पढ़ते हुए कहा –
मोह माया मुख मोड़, जग रीति प्रीति तोड़,
हाथ हथेली हिना सजी की सजी छोड़ दी.
रिश्ते नाते भाये नहीं, हिंसा रास आये नहीं,
ध्यान ज्ञान में लगा के बुद्धि निज मोड़ दी।
विजय जैन विज्जी ने अपनी पंक्तियों के माध्यम से राजुल की मनुहार को यूँ व्यक्त किया –
मत जाओ नेमिनाथ, राजुल पुकारे
है आठ भवों का साथ, राजुल पुकारे.
यादव कुल के धणी तुम ठाठ से बरात लाये.
बैठ के रथ में स्वामी तोरण तक आये.
क्यों लौट गयी बारात, राजुल पुकारे।
समाज सेविका पूनम यादव ने अपनी पंक्तियों में नेमीनाथ के वैराग्य पर कहा –
विवाह द्वार पर पशुओं की करुण पुकार कान में आयी
दया उमड़ी प्रभु के मन में वैराग्य की राह अपनायी
कवि बलराम सरस ने कहा –
हे भगवन नेमीनाथ आपका वंदन है।
देना हरपल मेरा साथ आपका वंदन है.
संस्थाध्यक्ष वरिष्ठ व्यंग्यकार सुभाष सनकी ने अपनी कविता का प्रारम्भ नेमीनाथ वंदना से करते हुए कहा –
हृदय में बसते नेमीनाथ, प्रभु की जय बोलो.
उनके चरणों में मम माथ, प्रभु की जय बोलो.
कवि रविकांत रवि एवं कवि ओमपाल जी ने भी अपनी प्रभावी कविताएं प्रस्तुत की.
अंत में संस्था सचिव मुरारी लाल मानव तथा संस्थापक कवि बलराम सरस ने सभी का आभार व्यक्त किया।













