सोनभद्र में बिजली विभाग की बड़ी लापरवाही! मौत से सबक नहीं, बिना सुरक्षा उपकरणों के खंभे पर चढ़ाए जा रहे कर्मचारी

रेणुकूट से विशेष खोजी रिपोर्ट
रिपोर्ट: डॉ. अजीत कुशवाहा (खोजी पत्रकार) – 7007596909
उत्तर प्रदेश सरकार लगातार श्रमिकों और कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर दिखाई देती है। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath समय-समय पर सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश देते रहे हैं कि किसी भी कर्मचारी की जान जोखिम में डालकर कार्य न कराया जाए। लेकिन सोनभद्र जिले के रेणुकूट नगर पंचायत क्षेत्र में जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे इन निर्देशों की खुली अवहेलना का संकेत देती हैं।
जांच के दौरान एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मुख्य हाईवे पर स्थित बिजली के खंभे पर एक लाइनमैन को बिना हेलमेट, बिना सुरक्षा बेल्ट, बिना दस्ताने और बिना किसी सुरक्षा उपकरण के चढ़ाकर लाइन कटवाने का कार्य कराया जा रहा था। हैरानी की बात यह है कि यह सब संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी में हो रहा था।
क्या कर्मचारी की जान की कोई कीमत नहीं?
जिस स्थान पर यह कार्य कराया जा रहा था, वहां प्रतिदिन हजारों वाहनों का आवागमन होता है। किसी भी क्षण छोटी सी चूक एक बड़ी दुर्घटना में बदल सकती थी। सवाल यह है कि यदि उस कर्मचारी के साथ कोई हादसा हो जाता, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता?
जब मौके पर मौजूद अधिकारियों से इस विषय में सवाल किया गया तो वे स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आए। जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी सुरक्षा नियमों के पालन को लेकर गंभीर दिखाई नहीं दिए।
ओमप्रकाश की मौत के बाद भी नहीं जागा विभाग
सूत्रों के अनुसार पिपरी निवासी लाइनमैन ओमप्रकाश की संदिग्ध परिस्थितियों में कुछ समय पहले मौत हो चुकी है। उनका शव बरामद हुआ था, जिसका मामला पिपरी थाने में दर्ज बताया जाता है।
परिवार का आरोप है कि आज तक विभाग का कोई अधिकारी उनके घर हालचाल पूछने तक नहीं पहुंचा। न कोई संवेदना व्यक्त की गई और न ही किसी प्रकार का सहयोग मिला।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक कर्मचारी की मौत के बाद भी क्या विभाग ने कोई सबक नहीं लिया?
100 नंबर पुलिस ने भी दी चेतावनी
मौके पर मौजूद पुलिस कर्मियों ने भी विभागीय कर्मचारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि इस प्रकार बिना सुरक्षा उपकरणों के कार्य कराना गंभीर खतरे को निमंत्रण देना है। पुलिस ने भविष्य में ऐसी लापरवाही से बचने की सलाह दी।
गलती स्वीकारने के बजाय बचाव की कोशिश
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर ध्यान दिलाए जाने के बाद भी संबंधित कर्मचारी और अधिकारी अपनी गलती स्वीकारने के बजाय उसका बचाव करते नजर आए। ऐसा प्रतीत हुआ मानो नियमों का पालन करना उनकी प्राथमिकता नहीं है।
जनता से बड़ा सवाल
क्या किसी कर्मचारी की जान इतनी सस्ती है कि उसे बिना सुरक्षा उपकरणों के मौत के मुंह में भेज दिया जाए?
क्या सुरक्षा नियम केवल कागजों तक सीमित हैं?
क्या विभागीय अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के जीवन की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?
और यदि कोई हादसा होता है, तो उसके परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
कार्रवाई किस पर होनी चाहिए?
यदि जांच होती है तो कार्रवाई उस गरीब कर्मचारी पर नहीं, बल्कि उन अधिकारियों और जिम्मेदार कर्मचारियों पर होनी चाहिए जिन्होंने उसे बिना सुरक्षा उपकरणों के खतरनाक कार्य करने का आदेश दिया।
एक जिम्मेदार लोकतंत्र में कर्मचारी की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि आज भी ऐसी लापरवाही जारी रही तो भविष्य में किसी बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अब देखना यह है कि यह खबर संबंधित अधिकारियों तक पहुंचने के बाद विभाग सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर कदम उठाता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।









