पप्पू सिंह की खास रिपोर्ट
तिकुनियां (लखीमपुर खीरी) क्षेत्र में भारत-नेपाल सीमा पर खाद (विशेषकर यूरिया और डीएपी) की तस्करी एक गंभीर समस्या है। स्थानीय किसानों के हक की खाद का अवैध रूप से सीमा पार जाना न केवल कृषि व्यवस्था को प्रभावित करता है, बल्कि स्थानीय प्रशासन और निगरानी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है।
. स्थानीय किसानों को किल्लत, तस्करों को आसानी
कृत्रिम कमी (Artificial Scarcity): जब खाद की एक बड़ी खेप अवैध रूप से नेपाल भेज दी जाती है, तो स्थानीय बाजारों में अचानक कमी हो जाती है। इसके कारण भारतीय किसानों को समय पर खाद नहीं मिल पाती या उन्हें लंबी लाइनों में लगना पड़ता है।
नेपाल में ऊंची कीमतें: भारत में सरकार द्वारा किसानों को भारी सब्सिडी पर खाद दी जाती है, जिससे इसकी कीमत काफी कम होती है। नेपाल में इसकी कीमतें बहुत अधिक हैं, जिससे तस्करों को प्रति बोरी बड़ा मुनाफा (मार्जिन) मिलता है।
“आखिर इनको खाद दे कौन रहा है?”
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। बिना आंतरिक मिलीभगत के इतनी बड़ी मात्रा में खाद सीमा पार नहीं जा सकती:
कुछ स्थानीय डीलरों/दुकानदारों की संलिप्तता: नियमों के मुताबिक, खाद की बिक्री PoS (Point of Sale) मशीन के जरिए अंगूठा लगवाकर (आधार कार्ड लिंक) ही होनी चाहिए। लेकिन तस्कर और कुछ भ्रष्ट डीलर स्थानीय किसानों के दस्तावेजों का दुरुपयोग करके या बिना रिकॉर्ड के ब्लैक में खाद तस्करों को बेच देते हैं।
सीमावर्ती गांवों या दूरदराज के गोदामों में खाद का अवैध स्टॉक किया जाता है, जहां से इसे धीरे-धीरे नेपाल निकाला जाता है।









