क्या अब इस देश में न्यायालय नहीं, बल्कि पुलिस की गोलियाँ फैसला करेंगी? आलेख शंकर देव तिवारी

भरत भूषण तिवारी की मौत केवल एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि पूरे समाज के अंतर्मन को झकझोर देने वाली घटना है।
क्या अब इस देश में न्यायालय नहीं, बल्कि पुलिस की गोलियाँ फैसला करेंगी?

बिहार के भोजपुर जनपद के बिलौटी गाँव निवासी युवा भरत भूषण तिवारी की मृत्यु को लेकर जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे अत्यंत गंभीर और चिंताजनक हैं। आत्मसमर्पण के बाद भी उसका एनकाउंटर कर देना कानून के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। भरत ने आत्मसमर्पण किया था, तो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार था। उसे संविधान द्वारा प्रदत्त न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार था।
भरत भूषण तिवारी कोई आतंकवादी नहीं था। वह अपने गाँव क्षेत्र की समस्याओं, बाढ़, कटान, बदहाल व्यवस्थाओं और जनसरोकार के मुद्दों को उठाने वाला एक जागरूक युवा था।
आज भरत भूषण तिवारी का परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है। उनकी माता-पिता की चीखें, उनके परिजनों का दर्द और समाज की बेचैनी केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि उस विश्वास की पीड़ा है जो आम नागरिक कानून और न्याय व्यवस्था पर करता है।
सवाल केवल भरत तिवारी का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या सत्ता से सवाल पूछना अपराध है?
सवाल यह है कि क्या व्यवस्था की विफलताओं को उजागर करने वालों की आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी जाएगी?
सवाल यह है कि क्या एक नागरिक का जीवन इतना सस्ता हो गया है कि उसे न्यायिक प्रक्रिया के बिना ही समाप्त कर दिया जाए?
और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत का संविधान सर्वोच्च है या फिर कुछ लोगों की मनमानी?
आज एक ब्राह्मण युवा संदिग्ध परिस्थितियों में मारा गया है। उसके परिवार को न्याय दिलाना और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष न्यायिक जांच कराना सरकार की जिम्मेदारी है। मैं बिहार सरकार से मांग करता हूँ कि पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए एवं दोषी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो।

शोक संतप्त परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएँ। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा परिजनों को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
भरत भूषण तिवारी को न्याय मिले। यही लोकतंत्र की कसौटी है, यही संविधान का सम्मान है और यही मानवता की मांग है।

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