*कलम और सेवा की ललकार: लखनऊ की धरती पर ‘महाक्रांति’ का शंखनाद!*
*”जब तक प्रहरी सुरक्षित नहीं, तब तक लोकतंत्र सुरक्षित नहीं।”*
रिपोर्ट सिम्मी भट्टी
नई दिल्ली:
क्या आप जानते हैं कि एक पत्रकार और एक सामाजिक कार्यकर्ता की कलम और मेहनत, समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बनती है? लेकिन आज, उसी आवाज को दबाने की कोशिशें हो रही हैं। समय आ गया है कि हम अपनी खामोशी को तोड़ें और अपने अधिकारों के लिए *23 अगस्त 2026* को लखनऊ की सड़कों पर इतिहास लिखें।
*क्यों आवश्यक है यह महाकुंभ?*
वर्षों से हम केवल खबरें लिखते आए हैं, समाज की पीड़ा को ढोते आए हैं, लेकिन आज हमारी अपनी पीड़ा का कोई सुनने वाला नहीं है। *भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल)*
अब और इंतजार नहीं करेगा। यह केवल एक रैली नहीं, यह पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का आंदोलन है।
*सुरक्षा का कवच:* पत्रकार सुरक्षा कानून हमारी सबसे बड़ी मांग है। अब हमें लाठियों से नहीं, कानून से सुरक्षा चाहिए।
*अधिकारों का मान:* समाज सेवा और निष्पक्ष पत्रकारिता कोई पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का यज्ञ है। इस यज्ञ के पुरोहितों का अपमान अब और नहीं सहा जाएगा।
*निर्णायक संवाद:* हम सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-निर्धारकों से सीधे संवाद करेंगे। हम उनसे पूछेंगे कि लोकतंत्र के इन स्तंभों के प्रति सरकार की जिम्मेदारी क्या है?
✊ जागिए! अब लड़ाई आर-पार की है!
“एक रुपया और एक संकल्प: महाक्रांति की महाशक्ति।”
हमारे संस्थापक एके बिंदुसार और केंद्रीय सलाहकार परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष कृष्ण माधव मिश्रा ने स्पष्ट किया है—यह लड़ाई किसी नेता के भरोसे नहीं, बल्कि हमारे आपसी एकता के भरोसे लड़ी जाएगी। यह 10 वर्षों का अब तक का सबसे विशाल और भव्य आयोजन होने वाला है।
*इस महारैली के केंद्र में आप हैं:*
*कर्मवीर सम्मान:* जो निडर रहे, जो ईमानदार रहे, जो समाज के लिए ढाल बने—उन सभी ‘कर्मवीरों’ को सम्मानित कर हम अपनी बिरादरी की शक्ति का प्रदर्शन करेंगे।
*राजनीतिक संदेश:* इस मंच पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया जाएगा। उन्हें यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि पत्रकारिता और समाज सेवा का सम्मान ही चुनाव के मुद्दों की कसौटी होगा।
*ऐतिहासिक भागीदारी:* लखनऊ में जुटने वाली यह भीड़ केवल संख्या नहीं, बल्कि एक ‘संकल्प शक्ति’ होगी।
आपकी उपस्थिति ही हमारी सबसे बड़ी जीत है
साथियों, कलम की ताकत तब तक ही सार्थक है जब तक लेखक का सम्मान सुरक्षित है। अगर हम आज चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
*क्या आप तैयार हैं?*
अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए?
अपने सम्मान को पुनः प्राप्त करने के लिए?
एक ऐसे भारत के लिए जहाँ कलम के सिपाही और समाजसेवी निडर होकर काम कर सकें?
> *”आओ मिलकर इतिहास रचें, लखनऊ की सड़कों पर अपने अधिकारों की इबारत लिखें। क्योंकि हम केवल कलम नहीं चलाते, हम देश की तकदीर लिखते हैं।”*
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*आपका छोटा सा सहयोग, इस महाक्रांति को पूर्ण विराम तक पहुँचाएगा। आज ही जुड़ें—भारतीय मीडिया फाउंडेशन के साथ!*









