चौथा खंभा: सत्ता, विपक्ष और ‘मजबूरी’ के त्रिकोण में सिसकती पत्रकारिता, आलेख निशा कांत शर्मा

चौथा खंभा: सत्ता, विपक्ष और ‘मजबूरी’ के त्रिकोण में सिसकती पत्रकारिता

 

“जब देश के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी रीढ़ की मजबूती के बजाय ‘पेट की मजबूरी’ को अपनी सबसे बड़ी व्याख्या बना ले, तो समझ जाना चाहिए कि संकट किसी एक दल का नहीं, बल्कि संपूर्ण लोकतांत्रिक चेतना का है।”

 

रायबरेली की एक जनसभा में लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का ५३ सेकंड का वायरल वीडियो भारतीय जनसंचार, राजनीति और बाजारवाद के उस अंतर्संबंध को सतह पर ले आया है, जिसे अक्सर कालीन के नीचे छिपाने की कोशिश की जाती है। राहुल गांधी का मीडिया पर यह आरोप लगाना कि वे “अडानी-अंबानी की शादी दिखा देंगे, लेकिन किसानों की बात नहीं दिखाएंगे,” और पत्रकारों द्वारा बंद कमरों में “भैया, बच्चों को पालना है” जैसी मजबूरी का हवाला देना—एक साथ कई कड़वे सच और गंभीर यक्ष प्रश्न खड़े करता है।

 

इस विषय का मूल्यांकन न तो सत्ता के चश्मे से किया जा सकता है और न ही विपक्ष के तुष्टिकरण से। इसका विश्लेषण पूरी तरह निष्पक्ष, तथ्यात्मक और आत्मनिरीक्षण के धरातल पर होना आवश्यक है, चाहे वह सत्ता को चुभे, विपक्ष को आईना दिखाए या मीडिया कॉर्पोरेट्स को असहज करे।

 

१. कॉरपोरेटाइजेशन और मीडिया का बदला हुआ चरित्र (तथ्यात्मक धरातल)

 

राहुल गांधी के आरोपों में एक बड़ा ढांचागत सच छिपा है, जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। पिछले दो दशकों में भारतीय मीडिया का चरित्र ‘मिशन’ से बदलकर ‘विशुद्ध व्यवसाय’ (Pure Business Model) हो चुका है।

 

* टीआरपी और टीआरए (Total Revenue Area): मुख्यधारा के मीडिया चैनलों का राजस्व मुख्य रूप से कॉरपोरेट विज्ञापनों और सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है। ऐसे में, जो संस्थान वित्तीय रूप से भारी-भरकम पूंजीपतियों या सत्ता के विज्ञापनों पर आश्रित होगा, उसकी यह स्वाभाविक सांगठनिक मजबूरी बन जाती है कि वह उनके हितों के खिलाफ न जाए।

 

* मुद्दों का सरलीकरण: गंभीर जनसरोकार के मुद्दे जैसे—कृषि संकट, बेरोजगारी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महंगाई—लंबे समय की ग्राउंड रिपोर्टिंग मांगते हैं, जिसमें भारी खर्च होता है और ‘सनसनी’ (Sensationalism) कम होती है। इसके विपरीत, किसी हाई-प्रोफाइल शादी, सेलिब्रिटी गॉसिप या धार्मिक-राजनैतिक ध्रुवीकरण को दिखाना बेहद सस्ता, सुरक्षित और टीआरपी बटोरने वाला शॉर्टकट है।

 

इस लिहाज से मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जनसरोकारों से विमुख तो हुआ है, और यह इस दौर की सबसे बड़ी बौद्धिक गिरावट है।

 

२. ‘मजबूरी’ का नैरेटिव: श्रम शोषण या नैतिक आत्मसमर्पण?

 

राहुल गांधी का यह दावा कि पत्रकार उनसे बंद कमरों में अपनी ‘मजबूरी’ (नौकरी और सैलरी का हवाला) रोते हैं, मीडिया उद्योग के एक बहुत ही काले सच—’श्रम शोषण और असुरक्षा’—को उजागर करता है।

 

“सच्चाई यह है कि आज मीडिया घरानों में काम करने वाले बहुतायत पत्रकार ‘वेज बोर्ड’ या स्थायी नौकरियों के दायरे से बाहर हैं। वे अल्पकालिक अनुबंधों (Contracts) पर काम करते हैं, जहां संस्थान के संपादकीय रुख (Editorial Line) से असहमति जताने का सीधा मतलब होता है—अगले ही दिन नौकरी से हाथ धोना।”

 

परंतु, इस मानवीय संकट का एक दूसरा पहलू भी है। क्या ‘बच्चों को रोटी खिलाने’ की मजबूरी किसी पत्रकार को पत्रकारिता के मूल सिद्धांत—सत्य निष्ठा और निष्पक्षता—के पूर्ण आत्मसमर्पण की अनुमति दे सकती है? जब पत्रकारिता अपनी रीढ़ खोकर केवल एक ‘नौकरी’ बन जाती है, तो वह समाज की आंख-कान बनने के बजाय सत्ता या पूंजी की लाठी बन जाती है। यह विवशता समझने योग्य तो है, लेकिन इसे नैतिक रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता।

 

३. सत्ता और विपक्ष का दोहरा चरित्र: कोई दूध का धुला नहीं

जब भाजपा समर्थक यह कहते हैं कि “कांग्रेस अपनी राजनीतिक विफलताओं का ठीकरा मीडिया पर फोड़ रही है,” तो उनके इस तर्क में भी आंशिक सत्यता है। राजनीति का यह पुराना नियम है कि जब विपक्ष जनता के बीच अपनी पैठ मजबूत नहीं कर पाता, तो वह माध्यम (Media) को दोषी ठहराने लगता है।

 

लेकिन सत्ता पक्ष को भी यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या आज मीडिया पर अघोषित दबाव का माहौल नहीं है? क्या सरकारी विज्ञापनों के वितरण को वैचारिक अनुकूलता के पैमाने पर नहीं तौला जाता? बिल्कुल तौला जाता है। जो सरकारें (चाहे केंद्र की हों या राज्यों की) मीडिया को अपनी ‘पीआर एजेंसी’ (PR Agency) बनाने की होड़ में शामिल हैं, वे इस संकट की उतनी ही बड़ी जिम्मेदार हैं।

 

विपक्ष (कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों) का इतिहास भी इससे अछूता नहीं है। आपातकाल के काले दौर को देश भूला नहीं है, और आज भी जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं, वहां उनके खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों पर मुकदमे और गिरफ्तारियां आम बात हैं। यानी, “सत्ता में रहते हुए मीडिया को दबाना और विपक्ष में आते ही मीडिया की आजादी का रोना रोना—यह भारतीय राजनीति का एक चिरंतन पाखंड है।”

 

## साख का संकट और समाधान की राह

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा नुकसान देश के आम नागरिक का हो रहा है, जिसका मीडिया पर से भरोसा लगभग उठ चुका है। ‘गोदी मीडिया’ और ‘लुटियंस मीडिया’ जैसे तमगों ने पत्रकारिता की साख को दो धड़ों में बांटकर नष्ट कर दिया है।

 

राहुल गांधी ने मीडिया से “थोड़ी सी शर्म रखने” की अपील की, लेकिन यह समस्या केवल व्यक्तिगत ‘शर्म’ या नैतिकता की नहीं है; यह एक गहरे “व्यवस्थागत संकट” (Systemic Crisis) की है। जब तक भारतीय मीडिया का आर्थिक मॉडल पूरी तरह विज्ञापनों (विशेषकर सरकारी और बड़े कॉरपोरेट विज्ञापनों) के चंगुल से मुक्त होकर ‘पाठक/दर्शक आधारित’ (Subscription Model) नहीं होगा, तब तक निष्पक्षता की उम्मीद बेमानी है।

 

सत्ता, विपक्ष और मीडिया कॉर्पोरेट्स को यह समझना होगा कि यदि लोकतंत्र का यह चौथा खंभा पूरी तरह ढह गया, तो इसकी छत उन पर भी गिरेगी। पत्रकारों को अपनी ‘मजबूरी’ के ढाल के पीछे छिपना बंद करना होगा, सत्ता को आलोचना सहने का माद्दा विकसित करना होगा, और विपक्ष को मीडिया को कोसने के बजाय जनता के बीच अपनी जमीन इतनी मजबूत करनी होगी कि मीडिया उसे नजरअंदाज करने की जुर्रत न कर सके। सत्य यही है, और यह कड़वा सच सबको स्वीकार करना ही होगा।

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