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राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद : क्या देशभक्ति केवल जनता के त्याग का नाम है?आलेख निशा कांत शर्मा

राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद : क्या देशभक्ति केवल जनता के त्याग का नाम है?

 

राष्ट्र किसी एक व्यक्ति, दल या सरकार का नाम नहीं होता। राष्ट्र उन करोड़ों नागरिकों की सामूहिक चेतना, श्रम, आशाओं और संघर्षों का जीवंत स्वरूप होता है, जो अपने वर्तमान को तपाकर भविष्य का निर्माण करते हैं। इसलिए जब भी कोई सरकार “राष्ट्रहित” के नाम पर जनता से त्याग मांगती है, तब सबसे पहले यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सत्ता स्वयं उस त्याग का उदाहरण प्रस्तुत कर रही है? क्या शासन का आचरण भी उतना ही संयमित, उत्तरदायी और राष्ट्रनिष्ठ है, जितनी अपेक्षा वह नागरिकों से करता है?

 

पिछले बारह वर्षों में केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार ने राष्ट्रवाद को केवल एक राजनीतिक विमर्श नहीं रहने दिया, बल्कि उसे चुनावी रणनीति, भावनात्मक ध्रुवीकरण और नैतिक दबाव का ऐसा औजार बना दिया, जिसके सहारे हर आर्थिक कठिनाई, प्रशासनिक विफलता और नीतिगत भ्रम को “राष्ट्रहित” के आवरण में प्रस्तुत किया जाने लगा। अब स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा जनता से पेट्रोल-डीजल कम खर्च करने, विदेश यात्राएं रोकने, सोना न खरीदने और जीवनशैली में कटौती करने की अपील ने इस बहस को और तीखा कर दिया है।

 

प्रश्न यह नहीं है कि संकट की घड़ी में नागरिकों को संयम बरतना चाहिए या नहीं। भारत का समाज त्याग और अनुशासन की परंपरा वाला समाज है। इस देश ने युद्ध, अकाल, महामारी और आर्थिक कठिनाइयों में असाधारण धैर्य दिखाया है। प्रश्न यह है कि क्या सत्ता स्वयं उसी नैतिक कसौटी पर खरी उतर रही है, जिस कसौटी पर वह जनता को परखना चाहती है?

 

प्रधानमंत्री ने पश्चिम एशिया के संकट, तेल आपूर्ति और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव का हवाला देकर लोगों से ईंधन बचाने की अपील की। उन्होंने कारपूलिंग, मेट्रो, वर्क फ्रॉम होम, विदेश यात्राओं में कटौती और यहां तक कि सोने की खरीद टालने का सुझाव दिया। पहली दृष्टि में यह एक जिम्मेदार अपील प्रतीत हो सकती है। किंतु जब यही अपील ऐसे समय में आती है, जब सत्ता प्रतिष्ठान स्वयं अभूतपूर्व वैभव, भव्यता और सरकारी अपव्यय का प्रदर्शन कर रहा हो, तब जनता के मन में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।

 

क्या राष्ट्रहित केवल आम नागरिक के लिए ही लागू होता है?

क्या सरकारी वैभव, चुनावी रैलियां, हेलीकॉप्टरों की यात्राएं, विशाल रोड शो, भव्य समारोह और अरबों रुपये के प्रचार अभियान विदेशी मुद्रा और ईंधन की खपत से परे हैं?

क्या सत्ता के लिए अलग नैतिकता और जनता के लिए अलग अनुशासन निर्धारित कर दिया गया है?

 

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह रही है कि यहां जनता त्याग करने से पीछे नहीं हटती, बशर्ते उसे नेतृत्व में ईमानदारी और आत्मानुशासन दिखाई दे। यही कारण था कि 1965 के युद्धकाल में जब Lal Bahadur Shastri ने देशवासियों से सप्ताह में एक समय उपवास रखने का आग्रह किया, तो वह केवल भाषण नहीं था; वह उनके निजी आचरण का विस्तार था। उन्होंने स्वयं सादगी को जिया। इसलिए जनता ने उस अपील को आदेश नहीं, बल्कि नैतिक प्रेरणा माना।

 

इसके विपरीत आज का राजनीतिक वातावरण प्रतीकों और प्रचार से अधिक संचालित दिखाई देता है। जनता से मितव्ययिता की अपेक्षा की जाती है, लेकिन सत्ता के स्तर पर वैभव का प्रदर्शन निरंतर बढ़ता जाता है। एक ओर मध्यमवर्ग को विदेश यात्राएं स्थगित करने की सलाह दी जाती है, दूसरी ओर सत्ता और उद्योग जगत का उच्च वर्ग वैश्विक मंचों पर विलासिता का खुला प्रदर्शन करता है। यह विरोधाभास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है।

 

दरअसल समस्या केवल आर्थिक संकट की नहीं है; समस्या उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें सरकारें कठिन परिस्थितियों का पूर्वानुमान लगाने और समय रहते तैयारी करने के बजाय, अंतिम क्षण में जनता से त्याग की अपील करने लगती हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और तेल संकट के संकेत महीनों पहले से स्पष्ट थे, तो देश को पारदर्शिता के साथ वास्तविक स्थिति क्यों नहीं बताई गई? क्यों विपक्ष की आशंकाओं को केवल राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज किया गया? क्यों जनता को यह भरोसा दिलाया गया कि सब कुछ नियंत्रण में है?

 

लोकतंत्र में विपक्ष का काम केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि संभावित संकटों के प्रति सरकार को सावधान करना भी होता है। किंतु दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में भारत की राजनीति इस स्तर तक ध्रुवीकृत हो चुकी है कि सत्ता हर आलोचना को राष्ट्रविरोध और हर प्रश्न को षड्यंत्र मानने लगी है। यह प्रवृत्ति किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक है।

 

राष्ट्रवाद का वास्तविक अर्थ सत्ता से प्रश्न पूछने का अधिकार समाप्त करना नहीं होता। सच्चा राष्ट्रवाद सरकारों को अधिक जवाबदेह बनाता है, कम नहीं। वह नागरिकों को केवल त्याग करने के लिए प्रेरित नहीं करता, बल्कि सत्ता को भी संयमित और उत्तरदायी बनने के लिए बाध्य करता है।

 

आज भारत की सबसे बड़ी चुनौती केवल तेल संकट, महंगाई या विदेशी मुद्रा का दबाव नहीं है। उससे भी बड़ी चुनौती है — आर्थिक असमानता का बढ़ता हुआ अंतर। एक ओर करोड़ों युवा बेरोजगारी, महंगाई और असुरक्षित भविष्य से जूझ रहे हैं; दूसरी ओर एक छोटा-सा संपन्न वर्ग अभूतपूर्व संपत्ति और वैभव का प्रदर्शन कर रहा है। जब सरकार आम जनता से सोना न खरीदने की अपील करती है, तब स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा भी जन्म लेती है कि वह अति-विलासिता और अपव्यय के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी समान नैतिक कठोरता दिखाए।

 

भारतीय संस्कृति त्याग की संस्कृति है, किंतु यह त्याग सदैव न्यायपूर्ण साझेदारी पर आधारित रहा है। यहां राजा पहले संयम दिखाता था, तब प्रजा उसका अनुसरण करती थी। यदि त्याग केवल निम्न और मध्यम वर्ग का दायित्व बन जाए और विशेषाधिकार केवल सत्ता एवं पूंजी के पास केंद्रित रहें, तो राष्ट्रवाद धीरे-धीरे नैतिक प्रेरणा नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव का माध्यम बन जाता है।

 

यह भी स्मरण रखना होगा कि आर्थिक संकटों का समाधान केवल नागरिकों की खपत कम करवाकर नहीं निकलता। इसके लिए दीर्घकालिक नीतिगत दृष्टि, ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक संसाधनों का विकास, रोजगार सृजन, घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार और आर्थिक संस्थाओं में विश्वास आवश्यक होता है। यदि सरकार वास्तव में आत्मनिर्भरता चाहती है, तो उसे केवल नारों से आगे बढ़कर कृषि, लघु उद्योग, विनिर्माण और वैज्ञानिक अनुसंधान में ठोस निवेश करना होगा।

 

आज देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या राष्ट्रवाद केवल जनता के त्याग का दूसरा नाम बनकर रह जाएगा, या फिर सत्ता भी उसी आदर्श का पालन करेगी जिसकी अपेक्षा वह नागरिकों से करती है? क्योंकि लोकतंत्र में देशभक्ति का अर्थ केवल सरकार का समर्थन करना नहीं होता; बल्कि राष्ट्रहित में सत्ता से कठोर प्रश्न पूछना भी उतना ही आवश्यक होता है।

 

भारत की जनता ने हमेशा राष्ट्र के लिए त्याग किया है और आगे भी करेगी। लेकिन जनता यह भी देखना चाहती है कि सत्ता केवल उपदेश न दे, बल्कि उदाहरण भी प्रस्तुत करे। राष्ट्र निर्माण भाषणों, नारों और प्रतीकों से नहीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता, समान जिम्मेदारी और नैतिक नेतृत्व से होता है। और जब नेतृत्व स्वयं संयमित होता है, तभी जनता का त्याग राष्ट्र की शक्ति बनता है, अन्यथा वह केवल असंतोष और अविश्वास को जन्म देता है।

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