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न्यायिक स्वतंत्रता का क्षरण: ‘चेक और बैलेंस’ का संकट आलेख निशा कांत शर्मा एडवोकेट

न्यायिक स्वतंत्रता का क्षरण: ‘चेक और बैलेंस’ का संकट

भारतीय संविधान ने ‘शक्ति के पृथक्करण’ (Separation of Powers) का सिद्धांत इसलिए अपनाया था ताकि कोई भी एक अंग निरंकुश न हो सके। न्यायपालिका का कार्य सत्ता को रोकना है, उसका सहयोगी बनना नहीं।

 

1. ‘पोस्ट-रिटायरमेंट’ नियुक्तियाँ: नैतिकता की बलि

 

जब एक जज यह जानता है कि सेवानिवृत्ति के अगले दिन उसे किसी आयोग का अध्यक्ष, राज्यसभा की सीट या राजभवन का सुख मिल सकता है, तो उसके फैसलों में अनजाने ही ‘सत्ता के प्रति झुकाव’ आने की संभावना बढ़ जाती है।

 

* समाधान: कई विधि आयोगों ने सुझाव दिया है कि रिटायरमेंट के बाद जजों के लिए कम से कम 2 साल का ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ अनिवार्य होना चाहिए, ताकि न्याय की निष्पक्षता पर संदेह न रहे।

 

2. कोलेजियम और कार्यपालिका का ‘वीटो’

 

वर्तमान में कोलेजियम व्यवस्था और सरकार के बीच जो रस्साकशी चल रही है, उसने न्यायपालिका को प्रशासनिक रूप से पंगु बना दिया है। जब सरकार उन जजों की नियुक्तियों को रोक लेती है जो स्वतंत्र विचार रखते हैं, तो वह न्यायपालिका के भीतर एक ‘अदृश्य सेंसरशिप’ लागू कर देती है। यह ‘सबमिशन’ (झुकने) की संस्कृति को बढ़ावा देता है।

 

3. ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ का विवाद

 

चीफ जस्टिस का विशेष अधिकार कि वह कौन सा मामला किस बेंच को देंगे, अब विवादों के घेरे में है। यदि संवेदनशील राजनीतिक मामले केवल कुछ ‘विशिष्ट’ बेंचों के पास ही जाते हैं, तो न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता दांव पर लग जाती है। 2018 की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस इसी पारदर्शिता की कमी का रोदन थी।

 

## न्यायिक पतन के सामाजिक और वैश्विक परिणाम

 

अदालतें केवल कानून की व्याख्या नहीं करतीं, वे समाज का ‘नैतिक कंपास’ भी होती हैं।

 

* अराजकता का भय: जब नागरिकों को लगने लगता है कि अदालतें उन्हें सत्ता के दमन से नहीं बचाएंगी, तो वे कानून को अपने हाथ में लेने की ओर प्रवृत्त होते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए ‘सुसाइड नोट’ की तरह है।

* वैश्विक साख: विदेशी निवेश और कूटनीति इस बात पर टिकी होती है कि किसी देश का विधिक ढांचा कितना स्थिर और निष्पक्ष है। यदि भारत की अदालतों पर ‘वैचारिक कब्जे’ (Judicial Capture) का लेबल लग गया, तो यह आर्थिक रूप से भी आत्मघाती होगा।

 

## क्या अब भी कोई उम्मीद शेष है?

 

इतिहास गवाह है कि न्यायपालिका ने समय-समय पर खुद को पुनर्जीवित किया है। 1975 के ‘एडीएम जबलपुर’ केस (आपातकाल का काला अध्याय) के बाद न्यायपालिका ने पीआईएल (PIL) के माध्यम से अपनी खोई हुई साख वापस पाई थी।

 

* पुनरुद्धार के आवश्यक कदम:

 

1. न्यायिक जवाबदेही कानून: जजों के आचरण और नियुक्तियों में पारदर्शिता के लिए सख्त कानून।

2. स्वतंत्र सचिवालय: कोलेजियम का अपना स्वतंत्र सचिवालय हो जो सरकार के प्रशासनिक दबाव से मुक्त हो।

3. जन-आंदोलन: जैसा कि आपने उल्लेख किया, नागरिक चेतना ही वह अंतिम हथियार है जो संस्थाओं को जवाबदेह बनाती है।

 

# अन्ततः

 

न्यायपालिका वह ‘अंतिम फ्यूज’ है जो लोकतंत्र के सर्किट को जलने से बचाता है। यदि न्यायपालिका सत्ता का ‘एक्सटेंडेड आर्म’ बन जाती है, तो संविधान केवल एक कागज़ का टुकड़ा बनकर रह जाएगा। दुष्यंत दवे जैसे कानूनी दिग्गजों की आवाज़ उस ख़तरे की घंटी है जिसे यदि अनसुना किया गया, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

 

न्यायपालिका को ‘रबड़ स्टैंप’ बनने से बचाना केवल वकीलों या जजों का काम नहीं है; यह हर उस व्यक्ति का धर्म है जो ‘संविधान’ में विश्वास रखता है।

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