राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के बीहड़ में भटकता ‘बाह’ का विकास
शंकर देव तिवारी

देश के राजनीतिक फलक पर जहां एक ओर बड़े-बड़े नीतिगत दावों और मौलिक अधिकारों की बहसों का शोर है, वहीं स्थानीय स्तर पर ज़मीनी हकीकत आज भी गुटबाज़ी और अधूरे वादों के चक्रव्यूह में फंसी हुई है। ऐतिहासिक और राजनैतिक रूप से समृद्ध भदावर क्षेत्र यानी बाह तहसील इसका एक जीवंत उदाहरण है, जहां सत्ता का रंग भले ही बदला हो, लेकिन आंतरिक खींचतान और गुटबाज़ी की संस्कृति आज भी उतनी ही पुरानी है जितनी शंभू नाथ चतुर्वेदी और विद्यावती राठौर के दौर में हुआ करती थी। आज के परिदृश्य में एक ही संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले दो जनप्रतिनिधियों के कार्य करने की शैली में ज़मीन-आसमान का अंतर है। एक तरफ जहाँ पारंपरिक ‘आस्था’ और पुराना रसूख है, तो दूसरी तरफ ‘वर्तमान’ की व्यावहारिक राजनीति। केंद्र और राज्य की योजनाओं को भुनाने की होड़ में दोनों ही पक्ष खुद को बराबर प्रयासरत दर्शाते हैं, लेकिन धरातल पर इस राजनैतिक प्रतिस्पर्धा का नतीजा सिर्फ जनता के हिस्से का इंतज़ार बनकर रह गया है।
इस व्यवस्था में एक प्रतिनिधि बाह का होने की वजह से जिले की मांग और स्टेडियम जैसी बड़ी ज़रूरतों पर मौन सहमति देकर भी अपने हाथ खींच लेते हैं, तो दूसरे प्रतिनिधि ‘ना’ तो कभी नहीं कहते, लेकिन उनका रास्ता ‘आम’ न होकर इतना ‘खास’ होता है कि नीतियां फाइलों से बाहर नहीं आ पातीं। नेताओं की इसी ‘खास’ कार्यशैली और आपसी खींचतान ने बाह को देश और प्रदेश की मुख्यधारा की विकास शक्तियों से वंचित कर रखा है। बाह की इस धरती ने देश को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसा व्यक्तित्व दिया और यहाँ बटेश्वर जैसी ‘छोटी काशी’ है, लेकिन इस ऐतिहासिक गौरव के पीछे की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। बुनियादी समस्याओं का एक ऐसा व्युत्क्रम यहाँ हावी है, जो शिक्षा से लेकर सिंचाई तक फैला हुआ है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक का ढांचा पूरी तरह चरमराया हुआ है, जिससे युवाओं को रोजगार के अभाव में पलायन करना पड़ रहा है। चंबल और यमुना के दोआब में बसे होने के बावजूद आज भी निजी क्षेत्र की सिंचाई और पीने के पानी की समस्या जस की तस है। बीहड़ लगातार बढ़ रहे हैं और उपजाऊ ज़मीन घटती जा रही है, जिससे खेती पर संकट गहरा गया है।
क्षेत्र में रेल और नहर का आगमन तो हुआ, लेकिन वे भी आधी-अधूरी व्यवस्था के कारण जनता की उम्मीदों की दिशा नहीं बदल सके। रेल आई पर प्रमुख गाड़ियों के ठहराव नहीं मिले, जिससे यात्रा की राह सुगम नहीं हुई। नहर आई तो उससे जुड़े बम्बे नहीं बने, जिससे टेल यानी अंतिम छोर तक पहुँचने से पहले ही पानी खत्म हो जाता है। चंबल में पानी के बंटवारे और घटते जलस्तर की बहस ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। एक तरफ यमुना पर पुलों का जाल बिछ रहा है, तो दूसरी तरफ चंबल क्षेत्र उपेक्षा का शिकार है। आज़ादी के इतने दशकों बाद भी ‘सुनसार पूरा’ जैसे कई गांव पक्की सड़कों की राह देख रहे हैं। विडंबना यह है कि जब बुनियादी हकीकत इतनी बेनूर हो, तब चुनावी या सियासी ‘छोटी दिवाली’ मनाने की औपचारिकताएं धरातल के अंधेरे को दूर नहीं कर सकतीं। बाह को नजदीक से देखकर आज यह कतई अहसास नहीं होता कि यह वह राजनैतिक भूमि है जिसके मालिक स्वयं यहाँ के जन-प्रतिनिधि हैं। जब तक ये प्रतिनिधि अपने ‘खास रास्तों’ को छोड़कर आम जनता के बुनियादी रास्तों पर नहीं चलेंगे, तब तक बटेश्वर और अटल की यह पैतृक स्थली विकास के बीहड़ में ऐसे ही भटकती रहेगी।
















