पहले नौकरी दो!
बस एक नारा… और पूरा माहौल ऐसा बदला कि मंच पर सन्नाटा छा गया। जिन भाषणों को टीवी स्क्रीन पर ताली-मार बताया जाता है, वो जनता की हूटिंग के शोर में गुम हो गए।
आंध्र प्रदेश के रायलसीमा में आज देखने को मिला, वह सिर्फ एक भाषण का रुकना भर नहीं, बल्कि सियासत के बंद कमरों में गूंजने वाली एक सीधी चेतावनी है।
मंच बेहद भव्य सजाया गया था। कतार में बैठे थे बड़े-बड़े चेहरे—एक तरफ केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, दूसरी तरफ राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, साथ में डिप्टी सीएम पवन कल्याण और मंच की शोभा बढ़ाते देश के शीर्ष उद्योगपतियों में शुमार अनंत अंबानी। लगा था कि आंकड़ों की बाजीगरी होगी, निवेश के बड़े-बड़े दावे गढ़े जाएंगे, तालियों की गड़गड़ाहट में सुर्खियां बटोरी जाएंगी और शाम तक ‘शानदार सभा’ के कसीदे पढ़ दिए जाएंगे।
लेकिन जैसे ही वित्त मंत्री ने माइक संभाला, ज़मीन पर खड़े युवाओं ने वो सवाल दाग दिया जिसे सत्ता के गलियारों में अक्सर दबा दिया जाता है—आलम यह हुआ कि वित्त मंत्री को अपना संबोधन बीच में ही रोकना पड़ा और स्थिति संभालने के लिए खुद मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को खड़े होकर हाथ जोड़कर जनता को शांत कराना पड़ा।
एक ही मंच पर देश का सबसे बड़ा खजांची, सबसे बड़ा उद्योग घराना और राज्य के सबसे बड़े सियासी रणनीतिकार मौजूद थे… लेकिन सामने खड़े खाली हाथ नौजवानों के एक बुनियादी सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था।
जब तक सवाल कागजों पर होते हैं, तब तक आंकड़े पेश कर दिए जाते हैं। जीडीपी की ग्रोथ रेट गिना दी जाती है। लेकिन जब वही सवाल लाखों बेरोजगार आंखों से सीधे मंच की ओर टकराता है, तो भारी-भरकम शब्द भी लड़खड़ा जाते हैं। मंच पर बैठे चेहरे हक्के-बक्के रह गए, क्योंकि जनता ने साफ कह दिया—अब बड़े-बड़े उद्योगपतियों की मौजूदगी से ज्यादा जरूरी घर का चूल्हा और हाथ का रोजगार है।
वक्त सच में बदल रहा है। अब जनता सिर्फ भाषण सुनने और ताली बजाने वाली भीड़ नहीं रही, अब वह हिसाब मांगने वाला नागरिक बन रही है।
सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोगों को समझ जाना चाहिए कि जब नौजवान सड़क पर हूटिंग करने लगे, तो समझो जुमलों की एक्सपायरी डेट नज़दीक आ चुकी है!















