एनओसी का ‘नरक’ और आवंटन का ‘अटैक’: आवास विकास का ओटी-सी घोटाला
उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद के दफ्तरों में

इन दिनों एक नया ‘तीर्थाटन’ शुरू हुआ है, जिसे सरकारी फाइलों में ‘ओटी-सी’ (वन टाइम सेटलमेंट) कहा जाता है। आम आदमी समझता है कि यह उसके बकाये से मुक्ति की योजना है, लेकिन दफ्तर की चौखट लांघते ही पता चलता है कि यह दरअसल ‘वन टाइम कलेक्शन’ की सामूहिक महा-आरती है। इस महा-आरती में पूछताछ काउंटर के छोटे दीवान से लेकर आयुक्त की ऊंची मसनद तक, हर कोई अपनी-अपनी अंजलि फैलाए पूरी तन्मयता से बैठा है। यहाँ लाभांश का ऐसा लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण हुआ है कि समाजवाद भी शरमा जाए!
जैसे ही आप ‘ओटी-सी’ की पवित्र नियत लेकर इस दफ्तर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं, पूरा दफ्तर अचानक ऐसे सक्रिय हो उठता है मानो किसी सूने पड़े अभयारण्य में कोई मोटा शिकार आ फंसा हो। आप अपने असली बाबू तक पहुंचें, उससे पहले ही दफ्तर के ‘अदृश्य गाइड’ आपके आवंटन पत्र (Allotment Letter) की ऐसी-ऐसी काल्पनिक कमियां और तकनीकी खोट आपके सामने परोस देंगे कि आपको अपनी ही ईमानदारी पर शक होने लगेगा। वर्षों पहले मिले आवंटन पत्र को ऐसे देखा जाता है मानो वह किसी दूसरे ग्रह का दस्तावेज हो। अपनी ओर से गढ़ी गई बेईमानियों का ऐसा अदभुत ताना-बाना बुना जाता है कि सीधा-साधा नागरिक खुद को जन्मजात अपराधी मानने पर मजबूर हो जाता है।
इसके बाद शुरू होता है असली खेल—एनओसी (अनापत्ति प्रमाणपत्र/No Objection Certificate) की फाइल का। इस दफ्तर में एनओसी का मतलब ‘नो ऑब्जेक्शन’ नहीं, बल्कि ‘नो ऑनलाइन क्लैरिटी’ होता है, ताकि बाबू को अपनी मर्जी से ‘ऑब्जेक्शन’ लगाने का पूरा हक मिले। बैंक के चालान से लेकर निबंधन (रजिस्ट्री) कार्यालय और कब्जा पत्र (Possession Letter) की उस रहस्यमयी फाइल की यात्रा में आपकी सांसें अटक जाती हैं। नियम तो बकाये में छूट देने का था, लेकिन इस ‘पवित्र नेक्सस’ की मेहरबानी देखिए कि आपकी मिलने वाली छूट की रकम से तिगुनी राशि तो ये लोग रास्ते के ‘दाम-दंड-भेद’ में ऐंठ लेते हैं। जेब खाली करने की इस कला में यह विभाग विश्वगुरु बनने की राह पर है। हद तो तब हो जाती है जब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए बनाई गई रियायतें हवा में लोप हो जाती हैं। बड़े भवनों की तरह ही गरीबों की फाइलों पर भी ब्याज की अदायगी और स्टांप का ऐसा मायाजाल बुना जाता है कि अंत में पीड़ित के हाथ में सिर्फ एक सरकारी रसीद थमा दी जाती है—जो इस बात का प्रमाण होती है कि आप आधिकारिक रूप से लूटे जा चुके हैं।
इस पूरे तमाशे को देखकर देश की न्यायप्रणाली के उस बदनाम किरदार ‘जज साहब के पेशकार’ के प्रति मन में अचानक अगाध श्रद्धा उमड़ पड़ती है। कम से कम वह अकेला ही ‘प्रसाद’ ग्रहण करता है और ऊपर-नीचे की पूरी चेन को खुद संभालकर आपको एक सम्मानजनक ‘अगली तारीख’ तो दे देता है! वहाँ कम से कम यह मानसिक शांति तो रहती है कि एक ही खिड़की पर काम तमाम हो गया। लेकिन आवास विकास के इस ओटी-सी लोक में तो आप सिर्फ एक ‘मूंजी’ (दुधारू गाय) हैं, जिसे तब तक दुहा जाएगा जब तक कि आपकी जेब में केवल बस का किराया न बच जाए।
सबसे शानदार नजारा तो तब दिखता है जब अखबारों में सुर्खियां छपती हैं कि ‘योजना के तहत आया अतिरिक्त धन वापस नहीं होगा।’ इस नियम के आते ही इन सरकारी गिद्धों की नजरें और चमचमा उठती हैं। उन्हें पता है कि जो आ गया, वो अब उनका साम्राज्य है। जनता त्राहि-त्राहि करे, पर मेजों के नीचे से सरकते हुए नोटों की सरसराहट इस दफ्तर का स्थायी राष्ट्रगान बन चुकी है। वाह रे ओटी-सी! एक बार सेटलमेंट क्या हुआ, आदमी जिंदगी भर के लिए री-सेटल होने लायक नहीं बचता।
– अनाम












