यदि हो रहा है तो खुले आम हो रहा हे आपदा का आमंत्रण
निर्माणाधीन पुल पर आवागमन: विकास की जल्दी या हादसों को आमंत्रण?
चम्बल। विकास तभी सार्थक है जब वह सुरक्षित हो। अधूरी संरचनाओं पर राजनीति या सुविधा के नाम पर यातायात शुरू करना प्रशासनिक अदूरदर्शिता को दर्शाता है। शासन को तुरंत इस ‘रिस्क’ को बंद करना चाहिए, क्योंकि किसी भी हादसे के बाद पछताने से बेहतर आज की सावधानी है।
मध्य प्रदेश में बुनियादी ढांचे का विकास तेजी से हो रहा है, जो कि सराहनीय है। लेकिन इस विकास की होड़ में सुरक्षा मानकों को ताक पर रखना एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां पुल का निर्माण कार्य अभी जारी है, लेकिन आम जनता के लिए रास्ता खोल दिया गया है। ‘सीडी (पुल या रैंप मार्ग) बनवा कर’ आधे-अधूरे ढांचे से आवागमन शुरू करना सीधे तौर पर निर्माण नियमों का खुला उल्लंघन है।
निर्माण नियमों की अनदेखी और तकनीकी खतरे
इंजीनियरिंग और निर्माण मानकों के अनुसार, किसी भी पुल को यातायात के लिए तब तक नहीं खोला जा सकता जब तक कि उसका निर्माण कार्य पूरी तरह संपन्न न हो जाए।
पुलों के हिस्सों को पूरी मजबूती हासिल करने के लिए एक निश्चित समय की आवश्यकता होती है। क्योरिंग प्रक्रिया पूरी होने से पहले वजन पड़ने पर कंक्रीट की आंतरिक संरचना कमजोर हो जाती है।
बिना पूर्ण निर्माण के ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ या सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट नहीं मिल सकती। ऐसे में जनता को वहां से गुजरने देना तकनीकी रूप से गैर-कानूनी है।
निर्माणाधीन पुलों पर अक्सर साइड रेलिंग, क्रैश बैरियर और संकेतक (Indicators) पूरी तरह नहीं लगे होते। रात के समय या खराब मौसम में यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है।
प्रशासनिक जिम्मेदारी और संभावित हादसा
शासन और संबंधित ठेकेदारों द्वारा जनता के दबाव या चुनावी जल्दबाजी में ऐसे रिस्क लेना भारी पड़ सकता है। यदि इस लापरवाही के कारण कोई छोटी सी भी चूक होती है, तो वह एक बड़े हादसे का रूप ले सकती है।
पुल से गुजरने वाले आम नागरिकों की जान दांव पर लगी है।
प्रशासनिक जवाबदेही: किसी भी अनहोनी की स्थिति में पूरी जिम्मेदारी मध्य प्रदेश शासन और निर्माण एजेंसी की होगी। कानूनी कार्रवाइयों और जनता के आक्रोश के सामने प्रशासन को ‘लेने के देने पड़ जाएंगे’।हादसे के बाद जांच कमेटियों और अदालती चक्करों के कारण वह परियोजना और अधिक लटक जाती है, जिससे जनता का पैसा और समय दोनों बर्बाद होते हैं।
इस गंभीर विषय पर शासन, प्रशासन और आम जनता तीनों को तुरंत संभलने की जरूरत है: मध्य प्रदेश शासन को सभी निर्माण साइट्स पर सख्त निर्देश जारी करने चाहिए। जब तक पुल का शत-प्रतिशत काम पूरा न हो और तकनीकी टीम हरी झंडी न दे, तब तक बैरिकेडिंग हटाकर आम रास्ता न खोला जाए। शार्टकट या अस्थाई ‘सीडी’ व्यवस्था बंद होनी चाहिए।
नियमों का उल्लंघन करने वाली निर्माण कंपनियों और ठेकेदारों पर भारी जुर्माना लगाया जाए और उनके लाइसेंस निलंबित किए जाएं। आम नागरिकों को भी जागरूक होना होगा। अपनी सुविधा के लिए निर्माणाधीन और खतरनाक रास्तों का उपयोग न करें। अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए चंद मिनटों की देरी को स्वीकार करें, न कि जोखिम भरे रास्तों को।
आफवाहे या आपदा आमंत्रण
पिनाहट। आज कल सोसल मीडिया में निर्माणाधीन चम्बल पुल से सीढ़ी बनाके लगनी है और पैदल यात्रा शुरू हो जानी है की सुचनाओं की भरमार है। मगर पुष्टि नहीं हो रहीं। एक सेतु निगम के सूत्र से बात हुई तो वह अपने स्तर से कुछ कहने की स्थिति में नहीं दिखे।













