लोकतंत्र का अदृश्य बंधुआ मजदूर: मानदेय और न्यूनतम आय के बीच पिसता जमीनी पत्रकार

एक पत्रकार की आय तो तय नहीं है, मगर उसका चौबीस घंटे का श्रम पूरी तरह तय है। समाज में उसका बौद्धिक और सामाजिक स्तर तो बहुत उच्च माना जाता है, लेकिन व्यवस्था की विडंबना देखिए कि उसके भीतर कभी कोई आर्थिक सोच या वित्तीय आत्मनिर्भरता पनपने ही नहीं दी जाती। उसे किसी मासूम बच्चे की तरह ‘आदर्श’, ‘संस्कार’ और ‘मिशन का अंग’ जैसे बड़े-बड़े शब्दों से शृंगारित कर दिया जाता है। जब भी वह अपनी बुनियादी आर्थिक जरूरतों की बात करता है, तो उसे ‘आर्थिक लोभ’ का हउआ दिखाकर, डरा-धमका कर शांत कर दिया जाता है। उसे वैचारिक रूप से इतना उन्मुक्त कर दिया जाता है कि वह भौतिक बंधनों को भूल जाए, लेकिन असलियत में वह व्यवस्था के एक ऐसे अदृश्य और मजबूत बंधन में जकड़ दिया जाता है, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी पत्रकार वहीं के वहीं अपनी फटीहाल जिंदगी जीने को विवश रहते हैं। आज का यह दौर डिजिटल क्रांति का युग है, चमत्कारों का युग है, लेकिन इस नए युग में भी जमीनी पत्रकारों को आधुनिकता और वित्तीय स्वायत्तता के इन चमत्कारों से जुड़ने नहीं दिया जाता। मीडिया घरानों और संगठनों की नई प्रबंधन टीमें आती तो हैं, लेकिन उनका पुराना दकियानूसी रवैया हमें पिछले दौर के शोषण और मजबूरी को भूलने नहीं देता।
मानदेय का छलावा बनाम मानवाधिकार और न्यूनतम आय
एक आम नागरिक की दृष्टि से जब हम पत्रकार की पीड़ा का तुलनात्मक अवलोकन करते हैं, तो रूह कांप उठती है। किसी भी लोकतांत्रिक देश की सरकार, श्रम मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन (जैसे International Labour Organization) किसी अकुशल श्रमिक, मनरेगा मजदूर या घरेलू कामगार के लिए भी एक ‘न्यूनतम मजदूरी’ (Minimum Wage) और सवैतनिक अवकाश तय करते हैं। मानवाधिकारों की बुनियादी परिभाषा यही कहती है कि हर व्यक्ति को उसके श्रम के बदले इतना पारिश्रमिक मिलना चाहिए जिससे वह गरिमापूर्ण जीवन जी सके।
परंतु, एक ग्रामीण या कस्बाई पत्रकार के मामले में सारे नियम, कानून और मानवाधिकार धरे के धरे रह जाते हैं। पत्रकार को मिलने वाला ‘मानदेय’ (Honorarium) या ‘पार्श्रमिक’ कोई तय वेतन नहीं, बल्कि एक तरह का आर्थिक छलावा है। कई बार तो यह मानदेय एक दिहाड़ी मजदूर की न्यूनतम आय के आधे हिस्से के बराबर भी नहीं होता। सरकार द्वारा तय अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे में पत्रकार से दिन-रात काम लिया जाता है। इस कड़वी सच्चाई का आत्मसात करना बेहद जरूरी है:
श्रमिक बनाम पत्रकार: एक दिहाड़ी मजदूर का काम का समय तय होता है और उसे न्यूनतम मजदूरी की कानूनी सुरक्षा मिलती है, जबकि पत्रकार की ड्यूटी २४ घंटे की होती है और उसकी आय शून्य या नाममात्र होती है।
मानवाधिकारों का हनन: बिना किसी आर्थिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा या भविष्य निधि (PF) के काम करवाना मानवाधिकारों के बुनियादी सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ है।
आर्थिक दोहन: ‘मिशन’ और ‘देशसेवा’ के नाम पर पत्रकारों का ऐसा आर्थिक शोषण किया जा रहा है जिससे वे केवल समाज के लिए सूचनाएं जुटाने का साधन बनकर रह गए हैं।
जब एक आम नागरिक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और न्यूनतम आय गारंटी का लाभ लेता है, तब समाज का सच लिखने वाला वही पत्रकार अपनी फटी जेब और बीमार परिवार को लेकर कोने में आंसुओं की घूंट पीता है। मानवाधिकार संगठन जिस ‘Right to Living Wage’ (गरिमापूर्ण कमाई का अधिकार) की वकालत करते हैं, वह अधिकार पत्रकारिता के इस चौथे स्तंभ के पैरों तले कुचल दिया जाता है।
उम्रदराज पत्रकारों के लिए बदलाव का आह्वान
इस दबी-कुचली और शोषित व्यवस्था के खिलाफ अब चुप बैठना आत्मघाती होगा। विशेष रूप से उन पत्रकारों के लिए जो जीवन के पचास बसंत पार कर चुके हैं और जिन्होंने अपनी पूरी जवानी इस व्यवस्था को सींचने में लगा दी, अब उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना सबसे बड़ा कर्तव्य है।
आओ, हम सब मिलकर पचास वर्ष से ऊपर की आयु वाले इन अनुभवी, जुझारू और संघर्षरत पत्रकारों के लिए विशेष कार्यशालाएं (Workshops) आयोजित करवाएं। इन कार्यशालाओं का उद्देश्य केवल पत्रकारिता सिखाना नहीं, बल्कि उन्हें डिजिटल युग के नए तौर-तरीकों, स्वतंत्र पत्रकारिता के आर्थिक मॉडलों (जैसे सब्सक्रिप्शन और डिजिटल प्लेटफॉर्म), तकनीकी ज्ञान और अपनी आर्थिक सुरक्षा व अधिकारों के लिए कानूनी रूप से सजग बनाना होगा। जब तक पत्रकार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और भयमुक्त नहीं होगा, तब तक निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद करना बेमानी है।
जय ग्रा प ए (ग्राणीण पत्रकार एसोसिएशन)













