*कलम के सिपाही का संघर्ष और उसकी बेबसी*
*कलम के सिपाही का कसूर क्या है?*
जिस दिन कलम डर गई, उस दिन सवाल मर जाएंगे। और जिस दिन सवाल मर गए, उस दिन लोकतंत्र की आवाज सिर्फ कागजों में रह जाएगी।
पत्रकार होना महज़ एक पेशा नहीं, बल्कि अपने सुकून, अपने परिवार और अपनी सुरक्षा को पीछे छोड़कर सच के साथ खड़े होने का एक साहसिक सफर है। जब शहर गहरी नींद में होता है, तब एक पत्रकार किसी घटना की तह तक पहुंचने के लिए जाग रहा होता है। उसके पास न तो धनबल होता है, न बाहुबल और न ही सत्ता का संरक्षण, उसके पास केवल एक कलम, एक कैमरा और सच को उजागर करने का अटूट साहस होता है।
विडंबना यह है कि आज व्यवस्था के कई दरवाज़े प्रभाव और ताकत से खुल जाते हैं, लेकिन जो पत्रकार अपनी कलम को नीलाम करने से इनकार कर दे, उसके सामने अचानक मुकदमों, नोटिसों और निराधार आरोपों की कतार खड़ी हो जाती है। कभी उसे ब्लैकमेलर कहा जाता है, तो कभी उसकी नीयत पर सवाल उठाए जाते हैं। पहले विज्ञापनों का लालच दिया जाता है, फिर आर्थिक दबाव बनाया जाता है, और जब बात नहीं बनती, तो चरित्रहनन का सहारा लिया जाता है।
समस्या तब विकट हो जाती है जब कुछ गलत लोगों की आड़ में पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यही दर्द आज ईमानदार अधिवक्ताओं का भी है, जो अदालत में किसी गरीब और पीड़ित की आवाज़ बनते हैं।
देश को आज़ाद हुए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन आज भी एक सवाल बार-बार जेहन में चुभता है, क्या हम सचमुच आज़ाद हैं? संविधान का अनुच्छेद 19(1) हमें पूर्ण रूप से स्वतंत्र और निर्भीक होकर लिखने की आज़ादी देता है, फिर क्यों आज भी स्वतंत्र पत्रकारों और निष्पक्ष वकालत करने वालों को निशाना बनाया जाता है? क्या खुलकर लिखना, सवाल पूछना या व्यवस्था की कमियों को उजागर करना अपराध बन गया है?
पत्रकार संवाद मंच की ओर से यह गंभीर आग्रह है कि शासन-प्रशासन इस विषय की गहराई को समझे। पत्रकारों या अधिवक्ताओं पर गंभीर आरोप लगने पर केवल पेशे की पहचान के आधार पर उन्हें दोषी न मानकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए। लखनऊ हो या देश का कोई अन्य कोना, स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए एक सुरक्षित और भयमुक्त माहौल बेहद जरूरी है।
आज ज़रूरत एक ऐसी व्यवस्था की है जहाँ कोई भी पत्रकार यह सोचकर कलम न उठाए कि सच लिखने पर अगला निशाना वह खुद हो सकता है। हर कलमकार को यह विश्वास होना चाहिए कि सच लिखना अपराध नहीं, सवाल पूछना गुनाह नहीं और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करना किसी सज़ा का पात्र नहीं है।
आखिर कलम के सिपाही का कसूर सिर्फ इतना ही तो है, वह बिकने से इनकार करता है।
*मोहम्मद सैफ साबरी*
*राष्ट्रीय महासचिव, पत्रकार संवाद मंच*













