*एटा जिले की धरोहर अंतरजी खेड़ा कब घोषित होगा पर्यटन स्थल*
दिल्ली -उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिले में सुमार जिला एटा को सतयुग से त्रेता और द्वापर तक जाना पहचाना जाता है,एटा जिले की धरोहर अंतरजी खेड़ा भगवान राम की सहायता करने की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बनी,
भगवान राम लंका पर विजय चढ़ाई करने जब निकलें तो पता चला विशाल समुद्र चारों तरफ से लंका पति की लंका को भेदने में दीवार बना खड़ा है,तब भगवान राम ने हनुमान को ऐंठा के अंतरजी खेड़ा के चक्रवती राजा वेन के पास सहायता के लिए भेजा,कलुयुग के हिसाब से अंतरजीखेड़ा से एक मिसाइल छोड़ी और लंका का एक बड़ा हिस्सा नेस्तनाबूद हो गया था, भगवान राम का विशाल मंदिर तो अयोध्या तीर्थ तैयार सरकार ने करा दिया है, लेकिन भगवान राम की सहायता करने वाली प्रयोगशाला बनी अंतरजीखेड़ा को अनदेखा कर दिया है, हजारों वीघा में फैला टीला वीरान हो रहा है,एटा में यूट्यूबर कहां मर गए,जो जान कर भी अंजान बने हैं,एटा के मारहरा विधानसभा क्षेत्र में अंतरजीखेड़ा को पुरातत्व विभाग ने अपने कब्जे में लेकर खुदाई कार्य प्रगति पर किया और चक्रवती राजा वेन के प्रयोगशाला की जमीन में दफन पारस मढ़ी/पत्थर को लेना चाहते थे, पुरातत्व विभाग की लेजर मशीने बताती पारश मढ़ी दो हजार फीट नीचे है, और खुदाई में खुदाई के बाद भी चमत्कारी मिट्टी के कड कड में चमत्कार दिखा और पारश मढ़ी पांच हजार फीट और नीचे दिखने लगी , तो पुरातत्व विभाग की टीम के हाथ पैर फूल गए और वापस टीम गई है, टैक्स फ्री केवल चक्रवती राजा वेन ने जनता को किया था, और ईमानदार निष्ठावान छवि के लिए जाने माने सत्य का धरती पर अवतरित अवतार था,हाथ वाले पंखे स्वयं बनाकर बेच कर आने वाले धन से जीवन यापन करते थे, शानो-शौकत करते तो पारस पत्थर को टच कर सोने की लंका बना सकते थे, रानी मां पानी में कमल की पंखुड़ियों पर बैठ कर स्नान कर लेती थी,
आज भी अंतरजीखेड़ा पर मजलूमों एवं असहाय लोगों को मजदूरी करने पर रुपए की झाड़ी पड़ी मिल जाती है,
लोगों के मुखविंदु से जाने अपने बुजुर्गो से जान सकते हैं,
*पर्यटन मंत्री कहां हो करोड़ों के वारे न्यारे कर रहे हो*
केविनेट पर्यटन मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार कहां हो जो करोड़ों रुपए की निधि मन्दिरों को देकर दूसरे हाथ से रुपए निकलबा कर चंद रुपए के ऐवज में करोड़ों के वारे न्यारे कर रहे हैं , भगवान राम की सहायता करने वाले एटा जिले को पर्यटन स्थल घोषित क्यों करोंगे, क्योंकि विधायक जी पर जमीनों के कब्जे से फुर्सत नहीं है जो अपने क्षेत्र की धरोहर पर मुख्यमंत्री से चर्चा करें,
अतरंजीखेड़ा उत्तर प्रदेश के एटा जिले में काली नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख प्राचीन और पुरातात्विक स्थल है। इसकी खोज सन 1862 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी। यहाँ हुए उत्खनन से यह पता चलता है कि यह स्थल प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्यकाल तक लगातार बसा हुआ था।भौगोलिक और सामान्य पहचानस्थिति: एटा जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर।नदी: गंगा की सहायक काली नदी के किनारे।संरचना: यह एक विशाल प्राचीन टीला है।प्राचीन नाम: बौद्ध साहित्य और चीनी यात्रियों (जैसे ह्वेनसांग) के विवरण में इसे ‘बैरंजा’ (Vairanja) या ‘पिलोशना’ कहा गया है।इतिहास और पुरातात्विक महत्वलौह युग: अतरंजीखेड़ा भारत के शुरुआती लौह युगीन स्थलों में विशेष स्थान रखता है। यहाँ से लोहे के औजार और मलवे बड़े पैमाने पर मिले हैं, जो यह बताते हैं कि इस क्षेत्र के लोग ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के अंत तक लोहे का उपयोग करना सीख गए थे।संस्कृति के चरण: यहाँ की खुदाई से मुख्य रूप से चार सांस्कृतिक चरण सामने आए:गेरुआ रंग के मृदभांड (OCP) संस्कृतिकाले और लाल मृदभांड संस्कृतिचित्रित धूसर मृदभांड (PGW) संस्कृति [उत्तर वैदिक काल]उत्तरी काले पॉलिश वाले मृदभांड (NBPW) संस्कृति [मौर्य काल]बौद्ध कनेक्शन: ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में भगवान बुद्ध यहाँ आए थे और उन्होंने इस नगर में अपना वर्षावास (वास) बिताया था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार इस यात्रा के दौरान उन्हें कुछ कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा था।क्या आप अतरंजीखेड़ा से जुड़ी किसी खास संस्कृति (जैसे चित्रित धूसर मृदभांड या लौह युग) के बारे में और अधिक विस्तार से जानना चाहते हैं?













