मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ को थानों में बिचौलियों की चुनौती, खाकी और तथाकथित पत्रकारिता का गठजोड़ बना नासूर:

*विशेष रिपोर्ट:*
*मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ को थानों में बिचौलियों की चुनौती, खाकी और तथाकथित पत्रकारिता का गठजोड़ बना नासूर:*

एके बिंदुसार
संस्थापक
भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी नई दिल्ली!

निशा कांत शर्मा की रिपोर्ट।
लखनऊ:

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी श्री आदित्यनाथ जी जहाँ एक ओर प्रदेश को ‘भयमुक्त और भ्रष्टाचार मुक्त’ बनाने के लिए दिन-रात संकल्पित हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। पूर्वांचल के वाराणसी और विंध्याचल (मिर्जापुर) मंडल, गोरखपुर मंडल, आजमगढ़ मंडल सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा, झांसी, शाहजहांपुर सहित सभी मंडलों के कई थानों में बिचौलियों का जमावड़ा मुख्यमंत्री के सपनों को पलीता लगा रहा है।
थानों में ‘रिमोट कंट्रोल’ से चल रही व्यवस्था,
थानों में आम जनता की सुनवाई होने के बजाय अब ‘दलाल’ तय कर रहे हैं कि किसकी एफआईआर लिखी जाएगी और किसका काम रुकेगा। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बिना योग्यता वाले ‘तथाकथित’ पत्रकार थानों के भीतर बैठकर थानेदारों के साथ ‘सेटिंग-गेटिंग’ का खेल खेल रहे हैं। इससे न केवल प्रशासन की छवि धूमिल हो रही है, बल्कि निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों एवं मीडिया संगठनों के पदाधिकारियों एवं निष्पक्ष सामाजिक कार्यकर्ताओं के सम्मान पर भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए ‘डिजिटल स्ट्राइक’ की दरकार
थानों में व्याप्त इस सिंडिकेट को तोड़ने के लिए अब कड़े प्रशासनिक हस्तक्षेप और तकनीक के उपयोग की आवश्यकता है।
1. सीसीटीवी की अनिवार्य लाइव मॉनिटरिंग:
थानाध्यक्ष के कक्ष से लेकर थाने के मुख्य गेट और जनसुनवाई वाले हर कोने में हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य हों।
इन कैमरों का फीड केवल थाने तक सीमित न रहे, बल्कि इनका सीधा जुड़ाव जिला मुख्यालय (SSP/SP कार्यालय) और प्रदेश मुख्यालय (लखनऊ) से पल-पल के लिए होना चाहिए।
2. कैमरे खराब होने पर ‘जीरो टॉलरेंस’:
अक्सर देखने को मिलता है कि संदिग्ध गतिविधियों के समय थाने के कैमरे ‘तकनीकी खराबी’ का बहाना बनाकर बंद कर दिए जाते हैं। शासन को नियम बनाना चाहिए कि जिस थाने का सीसीटीवी बंद पाया जाए, वहां के थानाध्यक्ष के खिलाफ तत्काल निलंबन और विभागीय कार्रवाई की जाए।
3. बिचौलियों और ‘छद्म पत्रकारों’ का प्रवेश वर्जित:
थानों में अनावश्यक रूप से बैठने वाले बाहरी व्यक्तियों और पत्रकारिता की आड़ में दलाली करने वालों को चिन्हित कर उन पर प्रतिबंध लगाया जाए।
केवल समाचार पत्र के संपादक, मीडिया संगठनों के अध्यक्षों के द्वारा पत्रकारों के नाम की सूची को संज्ञान में लेते हुए उन्हें ही थानों के खबरों को कवरेज करने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए एवं उनको ही आधिकारिक सूचनाओं हेतु अनुमति मिले, ताकि पत्रकारिता की गरिमा सुरक्षित रहे, इसके साथ ही प्रत्येक थाने लेवल पर पत्रकार समन्वय समिति का गठन आवश्यक तुम अनिवार्य रूप से किया जाए।
4. जनसुनवाई का ‘ऑडिट’ हो:
जनसुनवाई के दौरान आने वाली शिकायतों और उनके निस्तारण की गुणवत्ता की रैंडम जांच मुख्यालय स्तर से की जाए। यदि पीड़ित का काम किसी बिचौलिये के माध्यम से होने की पुष्टि हो, तो संबंधित पुलिसकर्मी पर कठोरतम दंड हो।
5. एल आई यू (LIU)को विशेष निगरानी सौंपी जाए:

1. थाने में ‘दलालों’ के प्रवेश पर नजर
LIU की जिम्मेदारी होती है कि वह इस बात की गोपनीय रिपोर्ट (GD) उच्चाधिकारियों को दे कि थाने में किन बाहरी व्यक्तियों का हस्तक्षेप अधिक है।
पहचान: यदि किसी थाने में कुछ खास ‘बिचौलिए’ या ‘दलाल’ सक्रिय हैं जो मुकदमों के निपटारे या पैरवी के लिए बार-बार आते हैं, तो LIU उनकी सूची तैयार करें।
साठगांठ की रिपोर्ट: यदि इन दलालों को पुलिस का संरक्षण प्राप्त है, तो LIU इसकी सूचना सीधे जिले के पुलिस कप्तान (SP/SSP) या इंटेलिजेंस मुख्यालय को भेजें ।
2. थानेदार (SHO) और पुलिसकर्मियों की गतिविधियों पर निगरानी
LIU का एक महत्वपूर्ण हिस्सा “Internal Vigilance” (आंतरिक सतर्कता) की तरह काम करता है।
भ्रष्टाचार और अवैध वसूली: यदि थानेदार या कोई सिपाही किसी अवैध धंधे (जैसे सट्टा, जुआ, अवैध खनन या शराब तस्करी) में लिप्त है या उनसे वसूली कर रहा है, तो LIU इसकी “इंटेलिजेंस नोट” तैयार करें ।
दुर्व्यवहार: यदि पुलिसकर्मियों का व्यवहार जनता के प्रति खराब है या वे पीड़ितों की सुनवाई नहीं कर रहे हैं, तो इसकी फीडबैक रिपोर्ट भी शासन को भेजी जाए।
थाने की गुटबाजी: पुलिसकर्मियों के बीच आपसी कलह या किसी खास राजनीतिक दल के प्रति झुकाव पर भी LIU नजर रखें।
3. गलत गतिविधियों पर अंकुश

गोपनीय जांच: जब किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ शिकायत मिलती है, तो उच्चाधिकारी LIU से उसकी गुप्त जांच (Secret Enquiry) निष्पक्ष जांच कराएं पीड़ित प्रार्थी को भी अवगत कराएं
प्रतिकूल प्रविष्टि (Adverse Entry): LIU की रिपोर्ट के आधार पर ही दागी पुलिसकर्मियों का तबादला ‘लाइन हाजिर’ करना या उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जाएं।
4. कानून-व्यवस्था और फीडबैक
तथ्यों का मिलान: कई बार थानेदार किसी घटना को दबाने या उसे छोटा दिखाने की कोशिश करते हैं। LIU का कार्य घटना की “वास्तविक रिपोर्ट” भेजना है ताकि शासन को सच्चाई पता चल सके।
जनता का विश्वास: थाने में आने वाले फरियादियों से बातचीत कर LIU यह पता लगाएं कि क्या पुलिसकर्मी काम के बदले पैसे की मांग कर रहे हैं।
प्रदेश का ऐसा कोई थाना नहीं है जहां बिचौलियों और दलालों का जमावड़ा नहीं होता होगा हर जगह ऐसी स्थिति है, जांच रिपोर्ट को समय-समय पर पत्रकारों के समक्ष प्रेस कांफ्रेंस के जरिए भी उजागर करने का प्रावधान हो।

यदि उत्तर प्रदेश को वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है, तो थानों को इन ‘सफेदपोश’ बिचौलियों के चंगुल से मुक्त करना ही होगा। सरकार को चाहिए कि वह जिलों के थानों की गुप्त जांच कराए और दोषियों पर ऐसी कार्रवाई करे जो पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल बने।

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