एटा का ‘सफेदपोश’ गुंडाराज और सोता हुआ प्रशासन!

*एटा का ‘सफेदपोश’ गुंडाराज और सोता हुआ प्रशासन!*

*​पत्रकार पंकज गुप्ता पर जानलेवा हमले के कई दिन बीते, कार्रवाई के नाम पर सिर्फ ‘निलंबन’ का झुनझुना; क्या खाकी और सफेद कोट का नेक्सस भारी है?*
*​भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल )का महा-ऐलान: न्याय नहीं मिला तो एटा से लेकर लखनऊ तक पत्रकार करेंगे महा आंदोलन, ठप होगा सिस्टम!*
लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार-
वरिष्ठ पत्रकार एके बिंदुसार
(संस्थापक -भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी नई दिल्ली)

​एटा।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हुए हमले को कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन न्याय की कछुआ चाल यह बताने के लिए काफी है कि एटा का प्रशासनिक तंत्र दोषियों को बचाने में जुटा है। ‘ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन’ के जिला अध्यक्ष पंकज गुप्ता को मेडिकल कॉलेज के भीतर बंधक बनाकर पीटना कोई मामूली विवाद नहीं, बल्कि उन ताकतों का सुनियोजित हमला था जो अस्पताल में चल रहे ‘रिश्वत के खेल’ को उजागर होने से बचाना चाहती हैं।
​निलंबन समाधान नहीं, सजा चाहिए!
​उप-मुख्यमंत्री बृजेश पाठक के हस्तक्षेप के बाद मुख्य आरोपी डॉ. मुकेश परमार को निलंबित तो कर दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि शेष 11 नामजद आरोपी अब तक खुलेआम क्यों घूम रहे हैं? क्या एटा पुलिस उन सफेदपोश गुंडों के सामने नतमस्तक है जिन्होंने एक पत्रकार का गला दबाकर उसे जान से मारने की कोशिश की? भारतीय मीडिया फाउंडेशन (BMF) नेशनल कोर कमेटी ने प्रशासन से पूछना चाहता है कि क्या किसी आम नागरिक ने डॉक्टर पर हाथ उठाया होता, तो क्या पुलिस इसी तरह फाइलों में धूल फांकती?
​भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं
​पंकज गुप्ता का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने एक गरीब मरीज से मांगी जा रही रिश्वत का विरोध किया था। आज एटा मेडिकल कॉलेज में इलाज की जगह कमीशनखोरी का बोलबाला है। सूत्रों की मानें तो यह मारपीट केवल एक डॉक्टर का गुस्सा नहीं था, बल्कि उन भ्रष्ट अधिकारियों की बौखलाहट थी जिनकी काली कमाई पर पंकज गुप्ता ने चोट की थी।
​भारतीय मीडिया फाउंडेशन की ‘सीधी चेतावनी’ (The Final Ultimatum)
​भारतीय मीडिया फाउंडेशन की राष्ट्रीय कोर कमेटी ने अब धैर्य की सीमा लांघ दी है। यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बालकृष्ण तिवारी ने स्पष्ट शब्दों में शासन और प्रशासन को आगामी कार्रवाई का संदेश भेज दिया है:
​गिरफ्तारी का अल्टीमेटम: यदि सभी नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी अभिलंब नहीं हुई, तो पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का संगठन एक मोर्चा बनाकर हजारों कार्यकर्ता एटा जिला मुख्यालय का घेराव करेंगे।
और ​ इस मामले की निष्पक्ष जांच और ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ की मांग को लेकर संगठन का एक प्रतिनिधिमंडल लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास पर दस्तक देगा।
​न्यायिक जांच और लाइसेंस रद्दीकरण: बीएमएफ की मांग है कि दोषियों को न केवल निलंबित किया जाए, बल्कि उनका मेडिकल लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द कर उन पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई हो।
​कलम बंद हड़ताल का आह्वान: यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं, तो मीडिया की भूमिका पर विचार करना होगा। संगठन पूरे प्रदेश के पत्रकारों से एकजुट होकर ‘कलम बंद’ विरोध के लिए तैयार रहने की अपील करता है।
​न्याय की मांग या जनांदोलन?
​प्रशासन यह न भूले कि पंकज गुप्ता अकेले नहीं हैं। उनके पीछे ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन की ताकत और भारतीय मीडिया फाउंडेशन का राष्ट्रीय संकल्प खड़ा है। हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक भ्रष्ट डॉक्टरों की जगह जेल की सलाखों के पीछे नहीं हो जाती। यह लड़ाई अब केवल पंकज गुप्ता की नहीं, बल्कि देश के हर उस पत्रकार की है जो सच बोलने का साहस करता है।
​”प्रशासन , हमारी चुप्पी को कमजोरी न समझें। यदि कलम के सिपाहियों का लहू बहा है, तो उसकी कीमत आरोपियों को चुकानी ही होगी।”

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