मीडिया सरकार एके बिंदुसार की खास रिपोर्ट।
*”न्याय की फाइल पर लगी धूल: कब जागेगा सिस्टम?”*
लखनऊ से दिल्ली तक एक ही आवाज गूंज रही है – “न्याय चाहिए, तारीख नहीं।”
एडवोकेट प्रबल प्रताप जैसे हजारों लोग आज सुप्रीम कोर्ट के गेट पर खड़े होकर पूछ रहे हैं कि आखिर न्याय को कछुए की चाल क्यों मिली हुई है?
*सच कड़वा है:*
1. *तारीख पर तारीख*: एक आम आदमी केस लेकर जाता है, 10-15 साल निकल जाते हैं। तब तक या तो वो थक जाता है या सबूत ही खत्म हो जाते हैं।
2. *भ्रष्टाचार की दीवार*: फाइल आगे बढ़ाने के लिए “सेटिंग” चाहिए। गरीब वहीं फंस जाता है जिसके पास वकील की फीस के भी पैसे नहीं।
3. *भरोसा टूट रहा है*: जब फैसला देर से आए तो वो फैसला नहीं, अन्याय लगता है।
न्याय व्यवस्था मंदिर है। लेकिन अगर मंदिर के पुजारी ही सो जाएं, तो आस्था कैसे बचेगी?
हमें जजों से नफरत नहीं चाहिए। हमें सिस्टम से जवाब चाहिए।
हमें चाहिए – फास्ट ट्रैक कोर्ट, खाली पड़े जजों की सीटें भरी जाएं, और हर केस की सुनवाई की समय-सीमा तय हो।
*संदेश साफ है:*
देश चलता है कानून से। और कानून चलता है समय पर मिले न्याय से।
अगर न्याय रेंगता रहा, तो लोग सड़क पर चलना सीख जाएंगे।
अब और इंतजार नहीं।
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