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महामना मालवीय मिशन, आगरा संभाग की श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्यानमाला सम्पन्न, रिपोर्ट शंकर देव तिवारी

*महामना मालवीय मिशन, आगरा संभाग की श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्यानमाला सम्पन्न*

 

*“गीता की दृष्टि में – जीवन की सफलता व सार्थकता” विषय पर पूज्य आचार्य स्वामी कृष्णकांत जी का प्रेरणादायी व्याख्यान*

 

आगरा,महामना मालवीय मिशन, आगरा संभाग के तत्वावधान में शनिवार को यूथ हॉस्टल, संजय प्लेस, आगरा में “श्रीमद्भगवद्गीता व्याख्यानमाला” का गरिमामय एवं प्रेरणादायी आयोजन सम्पन्न हुआ। व्याख्यानमाला का विषय “गीता की दृष्टि में – जीवन की सफलता व सार्थकता” रहा। कार्यक्रम का शुभारम्भ माँ सरस्वती एवं भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। तत्पश्चात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलगीत प्रस्तुत किया गया तथा मंचासीन अतिथियों का अंगवस्त्र, तुलसी का पौधा एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मान किया गया। इस अवसर पर मिशन की त्रैमासिक पत्रिका “मिशन संदेश” (अप्रैल–जून 2026, श्रीनगर विशेषांक) का लोकार्पण भी किया गया। महामना मालवीय मिशन, आगरा संभाग के उपाध्यक्ष श्री प्रभाकर शर्मा (आईआरएस) ने स्वागत उद्बोधन दिया तथा मिशन के मार्गदर्शक श्रीकृष्ण गौतम ने अपने आशीर्वचन में गीता के आदर्शों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। महामना मालवीय मिशन, आगरा संभाग के महासचिव एवं पर्यावरण कार्यकर्ता श्री राकेश चन्द्र शुक्ला ने स्वागत उद्बोधन देते हुए व्याख्यानमाला की पृष्ठभूमि, उद्देश्य तथा मिशन की भावी योजनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मिशन का उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के सार्वभौमिक संदेश को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाकर युवाओं में चरित्र निर्माण, राष्ट्रभाव, सेवा, समरसता एवं सांस्कृतिक चेतना का विकास करना है। मुख्य वक्ता पूज्य आचार्य स्वामी कृष्णकांत जी ने अपने लगभग डेढ़ घंटे के ओजस्वी एवं प्रेरणादायी व्याख्यान में कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवन जीने की शाश्वत कला है। उन्होंने कर्मयोग, समत्व, आत्मानुशासन, कर्तव्यनिष्ठा एवं राष्ट्रसेवा को गीता का मूल संदेश बताते हुए कहा कि गीता का अध्ययन तभी सार्थक है, जब उसके सिद्धांत हमारे व्यवहार में दिखाई दें।

उन्होंने अत्यंत रोचक उदाहरणों के माध्यम से बताया कि गीता जीवन को सफल बनाने के लिए मुख्यतः चार उपदेश देती है— पहला, किसी भी विषय पर निर्णय लेने से पहले दूसरे पक्ष की बात ध्यानपूर्वक सुनें; दूसरा, निर्णय सदैव दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही लें; तीसरा, कोई भी निर्णय मोह अथवा भावनात्मक आवेश में न लें; तथा चौथा, भारतीय संस्कृति “साधन” नहीं बल्कि “संबंध” प्रधान है। इसलिए जीवन के प्रत्येक निर्णय में संबंधों और मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। उनके प्रेरक एवं ओजस्वी उद्बोधन ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. (डॉ.) नरेश चन्द्र गौतम ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन प्रदान करने वाला अनुपम ग्रंथ है तथा इसके जीवन-मूल्यों को अपनाना आज की आवश्यकता है।कार्यक्रम का संचालन सुश्री श्रुति सिन्हा ने किया। कार्यक्रम में मिशन के मार्गदर्शक श्रीकृष्ण गौतम, उपाध्यक्ष श्री प्रभाकर शर्मा, डॉ. रजनीश, डॉ. गिरीश गुप्ता, श्री सतीश देव त्यागी, श्रीमती मीरा सक्सेना (आईआरएस), डॉ. विजय सिंघल, श्रीमती विनीता मित्तल, सुश्री श्रुति दास, श्रीमती आरती शर्मा, श्री मृदुल कुलश्रेष्ठ, श्री जितेन्द्र फौजदार, डॉ. मृदुल पांड्या, डॉ. वीरेन्द्र प्रकाश, डॉ. चांदनी यादव, श्रीमती पूनम वैष्णेय, डॉ. मंजू गुप्ता, श्री रामेन्द्र शर्मा, श्री उमाशंकर पराशर, श्री चतुर्वेदी तिवारी, श्री विजय गोयल, श्रीमती ऋतु गोयल, डॉ. ज्योति गुप्ता, श्री मुकेश जादौन, श्री सुरेश तिवारी, श्री प्रेम कुमार शर्मा, प्रो. सुरेन्द्र सिंह चौहान, श्री अमित लवानिया, श्री चन्द्रशेखर शर्मा, श्री अवनीश शुक्ला, श्री डी.के. पाण्डेय, श्रीमती नीलम गुप्ता, डॉ. आनन्द राय, श्री अशोक गौतम, श्री पी.के. शर्मा, श्री जगमोहन गुप्ता, प्रो. अमिता त्रिपाठी, श्री संतोष गौतम तथा श्री अजय गुप्ता सहित बड़ी संख्या में शिक्षाविदों, चिकित्सकों, पर्यावरणविदों, गीता चिंतकों, गोसेवकों, अधिवक्ताओं, उद्योगपतियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं महामना मालवीय मिशन के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने सहभागिता की। अंत में महासचिव श्री राकेश चन्द्र शुक्ला ने मुख्य वक्ता, अध्यक्ष, सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, मीडिया प्रतिनिधियों एवं कार्यक्रम की सफलता में सहयोग करने वाले सभी कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का समापन,वन्दे मातरम् के गायन,राष्ट्रगान के गायन

तथा स्वल्पाहार के साथ हुआ।

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