हाड़ा रानी का यह बलिदान हमें याद दिलाता है कि हमारी मिट्टी में ऐसी महान बेटियां हुई हैं, संकलन निशा कांत शर्मा एडवोकेट

साभार,

कल्पना कीजिए उस मंजर की… विवाह हुए अभी 24 घंटे भी नहीं बीते थे। हाथों की मेहंदी का रंग अभी छूटा भी नहीं था कि तभी महाराणा राज सिंह का संदेश आया “मुगल सेना हमला करने वाली है, तुरंत सीमा पर पहुँचो!” मेवाड़ के वीर सेनापति ‘रावत रतन सिंह चूंडावत’ के लिए यह धर्मसंकट की घड़ी थी। एक तरफ नई नवेली पत्नी थी और दूसरी तरफ राष्ट्र की रक्षा। भारी मन से रतन सिंह युद्ध के मैदान की ओर निकल पड़े, लेकिन उनका मन पल-पल अपनी रानी की यादों में भटक रहा था।

 

युद्ध के मैदान में पहुँचने के बाद भी राजा का मोह कम नहीं हुआ। उन्होंने अपने एक खास सेवक को महल भेजा और संदेश दिया— “रानी से कहो कि अपनी कोई ऐसी ‘निशानी’ दें, जिसे देख कर मैं युद्ध में अपना मन लगा सकूँ।”

जब सेवक ने रानी से निशानी मांगी, तो 18 साल की उस वीरांगना के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान आई। वह समझ गईं कि उनके पति का प्रेम उनके कर्तव्य की राह में कांटा बन रहा है। उन्होंने सोचा— “अगर एक सेनापति का ध्यान पत्नी में अटका रहेगा, तो मेवाड़ की हार निश्चित है। मेरे जीते-जी वो कभी एकाग्र नहीं हो पाएंगे।”

 

रानी ने तलवार निकाली और सेवक से कहा— “थाली लाओ, और इसे कपड़े से ढंककर ले जाना। मेरे स्वामी से कहना यही मेरी आखिरी निशानी है।”

इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, रानी ने एक ही झटके में अपना शीश काटकर थाली में गिरा दिया। वह 18 साल की बच्ची नहीं, मेवाड़ का स्वाभिमान थी जिसने साबित किया कि देश के लिए सुहाग क्या, खुद के प्राण भी तुच्छ हैं।

जब सेवक वह थाल लेकर रणभूमि पहुँचा और राजा ने कपड़ा हटाया, तो वहाँ कोई जेवर नहीं था… वहाँ उनकी पत्नी का मुस्कुराता हुआ कटा सिर था। राजा सन्न रह गए, उनकी रूह कांप गई। लेकिन उस कटे हुए सिर ने राजा को मोह से आजाद कर ‘महाकाल’ बना दिया।

रतन सिंह ने अपनी पत्नी के केशों को अपने गले में बांधा और काल बनकर मुगलों पर टूट पड़े। उन्होंने युद्ध जीता, मेवाड़ की रक्षा की, पर जीतने के बाद उसी मैदान में खुद को खत्म कर लिया क्योंकि अब इस दुनिया में उनके जीने की कोई वजह नहीं बची थी।

हाड़ा रानी का यह बलिदान हमें याद दिलाता है कि हमारी मिट्टी में ऐसी महान बेटियां हुई हैं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज जब हम मेवाड़ की बात करते हैं, तो यह बलिदान उस स्वाभिमान की मूक गवाह है जिसकी कीमत लहू से चुकाई गई थी।

अगर इस महान वीरांगना का बलिदान सुनकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो गया है, तो कमेंट में ‘जय हिंद’ जय भारत 🇮🇳 जरूर लिखें।

 

Leave a Comment