*एटा में गौशालाओं का गहन निरीक्षण, गौ संरक्षण एवं संवर्धन को समग्र विकास मॉडल के रूप में अपनाने पर जोर*
*एटा 22 अप्रैल 2026(सू0वि0)।* उ०प्र० गौ सेवा आयोग के मा० अध्यक्ष, मा० उपाध्यक्षगण एवं मा० सदस्यगण के मार्गदर्शन में गठित संयुक्त निरीक्षण दलों द्वारा प्रदेश के विभिन्न मण्डलों एवं जनपदों में गौशालाओं/गो आश्रय स्थलों का चरणबद्ध एवं गहन निरीक्षण किया जा रहा है। इसी क्रम में संयुक्त निरीक्षण दल द्वारा जनपद एटा में गौशालाओं का स्थलीय निरीक्षण किया गया तथा तत्पश्चात जनपद स्तरीय अनुश्रवण, मूल्यांकन एवं समीक्षा समिति की बैठक आयोजित की गई।
निरीक्षण एवं समीक्षा के दौरान प्रदेश सरकार की शीर्ष प्राथमिकता गौ संरक्षण एवं गौ संवर्धन को धरातल पर प्रभावी रूप से लागू करने की दिशा में विस्तृत विचार-विमर्श किया गया तथा संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट एवं समयबद्ध दिशा-निर्देश प्रदान किए गए।
इस अवसर पर विशेष रूप से गौवंशों के स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित पोषण, गो आधारित प्राकृतिक खेती के प्रसार तथा गोबर-गोमूत्र आधारित उत्पादों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण को विकास के केन्द्रीय बिंदु के रूप में रेखांकित किया गया।
गौ संरक्षण के प्रमुख आयाम
हरे चारे की वर्षभर उपलब्धता
गौशालाओं में सतत हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु गोचर/चारागाह भूमि पर नैपियर घास की व्यापक बुवाई कराए जाने के निर्देश दिए गए। इसके लिए शासन द्वारा प्रति हेक्टेयर लगभग ₹22,000 की सहायता प्रदान की जा रही है। साथ ही कृषकों को प्रति एकड़ ₹4,000 की सहायता एवं नैपियर की जड़ें उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे निरंतर हरा चारा उत्पादन सुनिश्चित हो सके। आगामी वर्ष में इन कृषकों से नैपियर की दुगुनी जड़ें प्राप्त कर अन्य किसानों को वितरित किया जाएगा, जिससे यह मॉडल आत्मनिर्भर रूप से विस्तार पा सके।
जहां गोचर भूमि उपलब्ध नहीं है, वहां स्थानीय कृषकों के साथ अनुबंध आधारित चारा उत्पादन (Contract Farming) को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे लगभग 40 गौवंश प्रति एकड़ के मानक पर ₹2.50-3.00 प्रति किलोग्राम की दर से हरा चारा उपलब्ध कराया जा सके।
संतुलित आहार एवं पोषण प्रबंधन
गौवंशों के समुचित पोषण हेतु हरे चारे के साथ भूसा, चोकर एवं संतुलित पशु आहार की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित किए जाने के निर्देश दिए गए। वर्तमान में गेहूं कटाई के कारण भूसा सुलभ है, अतः कम से कम 6 माह का अग्रिम भंडारण अनिवार्य रूप से किया जाए।
जिन गौशालाओं में भंडारण क्षमता सीमित है, वहां ग्राम स्तर पर उपलब्ध खाली भूमि पर सुरक्षित कूप/ढेर बनाकर अतिरिक्त भूसा भंडारित करने के निर्देश दिए गए, जिससे वर्षा ऋतु में भी भूसा सुरक्षित रहे। प्रत्येक गौशाला में स्वच्छ पेयजल (चूना युक्त) एवं सेंधा नमक लिक ब्रिक्स की व्यवस्था सुनिश्चित करने पर भी बल दिया गया।
मुख्यमंत्री सहभागिता योजना का व्यापक विस्तार ग्राम स्तर पर शिविर आयोजित कर युवाओं, महिलाओं एवं लघु/सीमांत किसानों को 1-4 देशी गौवंश उपलब्ध कराते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया। गोबर एवं गोमूत्र आधारित उत्पादों जैसे जैविक खाद, बायोपेस्टिसाइड, जीवामृत, घनामृत, बीजामृत आदि के माध्यम से रोजगार सृजन एवं आयवृद्धि के अवसर विकसित किए जाएंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिले।
गौ आधारित अर्थव्यवस्था एवं प्राकृतिक खेती
गौ आधारित मॉडल को अपनाते हुए बायोगैस संयंत्रों के माध्यम से घरेलू ईंधन एवं विद्युत उत्पादन कर गांवों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। बायोगैस से प्राप्त स्लरी का उपयोग गो आधारित प्राकृतिक खेती में कर मृदा की उर्वरता, जैविक कार्बन (Organic Biomass) एवं उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है।
रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए विषमुक्त (Chemical-free) कृषि उत्पादों को बढ़ावा देकर जनस्वास्थ्य में सुधार लाने पर भी बल दिया गया।
जनसहभागिता आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था युवाओं, महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) एवं किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की सक्रिय भागीदारी से— जैविक खाद, बायोपेस्टिसाइड, गोबर के गमले, गो-काष्ठ, धूप, गोनाइल, मूर्तियां आदि का उत्पादन कर गौ आधारित चक्रीय (Circular) ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्स्थापित एवं सुदृढ़ किया जा सकता है।
*गौशाला प्रबंधन हेतु अनिवार्य व्यवस्थाएं* बीमार एवं कमजोर गौवंशों हेतु आइसोलेशन/सिक वार्ड की स्थापना एवं उपचार की समुचित व्यवस्था, बछड़े एवं बछियों हेतु पृथक शेड एवं विशेष पोषण प्रबंधन, प्रत्येक विकास खण्ड स्तर पर नंदी (बैल) हेतु पृथक गौशाला की स्थापना, स्वच्छ पेयजल एवं पोषण संसाधनों की नियमित उपलब्धता
*विभागीय समन्वय एवं समेकित विकास मॉडल* ब्लॉक स्तर पर पशुपालन, कृषि, उद्यान, आयुष, कौशल विकास, यू०पी०-नेडा, सहकारिता, वन विभाग, MSME एवं NRLM/SRLM विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर गौ आधारित समग्र विकास मॉडल लागू करने के निर्देश दिए गए। प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर—
जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार, पर्यावरण संतुलन, रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों में कमी, सुनिश्चित की जा सकती है, जिससे स्वस्थ समाज एवं समृद्ध ग्राम्य अर्थव्यवस्था का निर्माण होगा।
*गौशालाओं का बेहतर संचालन एवं प्रबंधन* वर्ष 2024 के शासनादेश के अनुसार गौशालाओं के संचालन एवं प्रबंधन को सुदृढ़ बनाने हेतु अधिक से अधिक गौशालाओं को स्वयंसेवी संस्थाओं (NGOs), महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs), किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), गो-सेवी संस्थाओं एवं इच्छुक युवाओं को अनुबंध के आधार पर दिए जाने के निर्देश दिए गए। इससे संचालन की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर रोजगार सृजन एवं आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।
गौशालाओं में उत्तम नस्ल के देशी नंदी रखने एवं Sex Sorted Semen के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली नस्ल के संवर्धन पर विशेष बल दिया गया, जिससे दीर्घकाल में गौवंश संरक्षण को स्थायित्व प्रदान किया जा सके।
अंत में संयुक्त निरीक्षण दल द्वारा निर्देशित किया गया कि गौ संरक्षण एवं गौ संवर्धन को जनआंदोलन का स्वरूप प्रदान करते हुए इसे केवल पशुपालन तक सीमित न रखकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक खेती, ऊर्जा आत्मनिर्भरता एवं जनस्वास्थ्य से जोड़ते हुए एक समग्र एवं टिकाऊ विकास मॉडल के रूप में विकसित किया जाए।








