क्योँ लिखना पड़ा ज़ब ये पढ़ा
वरिष्ठ राजनीतिक संवाददाता विजय शंकर यादव की हालिया दुखद और गुमनाम मौत पत्रकार संगठनों की निष्क्रियता और पत्रकारों की सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा का एक जीवंत और दहला देने वाला ‘प्रतीक’ है। हजारों खबरें लिखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार का अंतिम समय में लावारिस जैसी स्थिति में चले जाना मीडिया जगत के लिए एक गहरा प्रश्नचिह्न है।
तब
विजय शंकर यादव: एक नाम नहीं, पत्रकारिता की असुरक्षित नियति का ‘प्रतीक’
कुछ ही समय पहले तक जो कलम सत्ता के गलियारों की हलचल और राजनीतिक बिसात की बारीकियाँ बुनती थी, वह आज खामोश हो चुकी है। हजारों महत्वपूर्ण खबरें लिखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक संवाददाता विजय शंकर यादव की गुमनामी और नितांत अकेलेपन में हुई मौत ने समूचे मीडिया जगत को एक आईना दिखाया है। उनकी अंतिम यात्रा में खून के रिश्तेदार भले न रहे हों, लेकिन कुछ गैर-अपनों का कंधा यह चीख-चीख कर कह रहा है कि फील्ड पर जीवन खपा देने वाले पत्रकारों की सामाजिक और संस्थागत सुरक्षा का ढांचा पूरी तरह ढह चुका है। विजय शंकर यादव महज एक दिवंगत पत्रकार का नाम नहीं हैं, बल्कि वे आज के दौर में पत्रकार संगठनों की संवेदनहीनता और पत्रकारों की असुरक्षित नियति के सबसे बड़े ‘प्रतीक’ बन गए हैं।
विजय शंकर यादव की अंतिम यात्रा हमें झकझोरने आई है। यह मौत एक अलार्म है कि यदि आज पत्रकार संगठनों ने अपने मूल चरित्र—’एकजुटता और सुरक्षा’—को वापस नहीं अपनाया, तो पत्रकारों की आने वाली पीढ़ियाँ सच लिखने का साहस खो देंगी। इस प्रश्नचिह्न को एक लक्ष्य में बदलना होगा, ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ केवल कागजों पर नहीं, बल्कि अपने कर्मियों के जीवन में भी मजबूत और सुरक्षित महसूस कर सके। यही विजय शंकर यादव जैसे समर्पित कलमकारों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
जब हम पत्रकार सुरक्षा की बात करते हैं, तो ध्यान केवल भौतिक हमलों या कानूनी उत्पीड़न पर जाता है। लेकिन विजय शंकर की कहानी एक दूसरे, कहीं अधिक क्रूर संकट की ओर इशारा करती है—वह है आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा। जीवन भर जिन संस्थानों के लिए पत्रकार ने अपनी ऊर्जा और साख दांव पर लगाई, संकट के समय वे संस्थान और पत्रकार संगठन कहाँ थे? यह प्रश्नचिह्न केवल मीडिया घरानों पर नहीं, बल्कि उन बड़े-बड़े पत्रकार संगठनों पर भी है जो पत्रकारों के हितों की रक्षा का दम भरते हैं। जब एक रीढ़ की हड्डी वाला पत्रकार अपने अंतिम दिनों में व्यवस्था और अपनों से बेगाना होकर दम तोड़ देता है, तब इन संगठनों के बड़े-बड़े दावों की हवा निकल जाती है।
पत्रकार संगठनों को अब केवल राजनीतिक रसूख बढ़ाने या क्लब चलाने के ढर्रे से बाहर आना होगा। उन्हें अपने सदस्यों के संकट के समय एक परिवार की तरह खड़े होने की व्यवस्था विकसित करनी होगी।
लक्ष्य निर्धारण: व्यवस्था में सुधार की मांग
यदि हम नहीं चाहते कि भविष्य में कोई और ‘विजय शंकर यादव’ इस तरह गुमनामी और बेबसी की मौत मरे, तो पत्रकार संगठनों को तुरंत निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित करने होंगे:
वरिष्ठ पत्रकार कल्याण कोष: एक अनिवार्य और सक्रिय वेलफेयर फंड का गठन हो, जो सेवानिवृत्त या बीमार पत्रकारों को तुरंत वित्तीय और चिकित्सीय सहायता प्रदान करे।
सक्रिय सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क: संगठनों का यह दायित्व होना चाहिए कि वे अकेले या संकट में रह रहे पत्रकारों की नियमित सुध लें, ताकि कोई भी खुद को व्यवस्था में लावारिस महसूस न करे।
मीडिया घरानों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे अपने पत्रकारों को न केवल नौकरी के दौरान, बल्कि उनके बाद भी एक गरिमापूर्ण जीवन और सुरक्षा ढांचा प्रदान करने में सहयोग करें।
















