*राजधानी में संचालित हो रहे हुक्का बार पर पुलिस कहती है हाईकोर्ट की अनुमति प्रदान है, वहीं संचालक कहते हैं कैफे/रेस्टोरेंट है…?*
लखनऊ
राजधानी लखनऊ में हुक्का बार के चलन को वैध बताते हुए बालिक और नाबालिक दोनों को धुएं का आदि तो बनाया जा रहा है, पर क्यों कैफे/रेस्टोरेंट का नाम बदनाम किया जा रहा है…?
अवैध हुक्का बार अवैध ही है, बस जिम्मेदारों के मुंह से उसे बचाने वाले शब्द मुस्कुराते हुए इतने मीठे लब्ज़ो से निकलते हैं कि सोचना पड़ता है कि हुक्का बार का संचालक जिम्मेदारों की जेब कितना भरता होगा…?
राजधानी में हुक्का बार अपने पैर पसार रहा है, पर क्या जिम्मेदारों के परिवार वाले या रिश्तेदार ऐसे स्थानों पर जाना पसंद करते होंगे..?, जो क्षेत्र के जिम्मेदार दूसरों के परिवार के सदस्य को बिगड़ता हुआ देख अपने फायदे के रिश्ते को और मजबूत कर रहे हैं…
हाईकोर्ट से हुक्का बार को कोई अनुमति नहीं, उच्च अधिकारी अवैध गतिविधियों पर सख्ती के दावें करते हैं, वहीं क्षेत्र के जिम्मेदारों के संरक्षण से फलता फूलता धुएं का अड्डा बालिक और नाबालिक दोनों को धुंए का आदि बना भी रहा है और चोरी चुपके यदि मादक पदार्थों इस्तेमाल हो जाए, तो आने वालों की सेवा में नशा भी शामिल हो जाता है, वहीं जिम्मेदारों की जेब में इजाफा होता ही रहता होगा…
फर्क इतना पड़ता है कि शिकायत करने वाले शिकायत करते रहें, लिखने वाले लिखते रहें और आरोप लगाने वाले आरोप लगाते रहें, पर अगर क्षेत्र के जिम्मेदार क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारी और कर्तव्य को समझ जाएं, तो गंदगी को कैसे साफ करना है और कैसे वातावरण को दूषित होने से बचाना है, बखूबी निभा डालेंगे, पर क्या ऐसा हो सकता है…?
















