सिर्फ स्मृतियों का सहारा………..
किसी भी व्यक्ति के जीवन में उसकी सबसे बड़ी क्षति उस वक्त कही जा सकती है जिस वक्त उसके सिर से उसके पिता का हाथ हमेशा के लिए हट जाये। 23 अक्टूबर 2025 के दिवस वह वक्त मेरे भी जीवन में आया जो मुझे एवं मेरे परिवार को अपूर्णीयक्षति दे गया। पापा के बिना आज एक वर्ष हो गया। उनके साथ बिताए जीवन के अनमोल पलों को स्मरण करके आज यह अहसास हो रहा कि पिता का साथ किस तरह से
आत्म विश्वास को बढ़ाता है।
जीवन में कई ऐसे मौके आये जब मैं जटिलता में उलझा पर उनके मार्गदर्शन एवं अनुभव ने हमें समस्याओं से आसानी से उबार लिया। अनेकों बार ऐसा हुआकि पिताजी ने अपनी बीमारी को महज इस कारण नहीं बताया कि हमें तनाव हो जायेगा। आज एक एक बात, उनके स्वभाव एवं रोजमर्रा की उनकी प्रतिक्रियाओं का स्मरण हो रहा है एवं मन में उनके ना होने की वेदना का बोध हो रहा है। मेरे शहर से बाहर जाने एवं वापस आने में होने वाली देर रात तक पापा जागते हुये इंतजार करते मिलते थे। हर शाम आफिस से घर पहुंचने की मेरी आहट वो यों ही सुन लेते थे। और फिर हम लोग साथ बैठ कर शाम की चाय लेते थे। किस प्रकार वह पारिवारिक एकता पर बल देते हुए जिम्मेदारी का बोध कराते थे। आज सब याद करके यही लग रहा है जैसे कल की ही तो बात है। और यह विश्वास नहीं हो रहा कि पापा अब नहीं हैं। अब बस यही अभिलाषा है कि जिस दायित्व को पिताजी जाते जाते सौंप कर गये वह जीवन पर्यन्त पूरी जिम्मेदारी के साथ निभता रहे।
ईश्वर से प्रार्थना है कि वो जिस जहां में है वहीं से उनकी आशीष मिलती रहे। कभी नई रचना हो तो फिर से मुझे उनका पुत्र होने का सौभाग्य प्रदान करे।
।। प्रथम पुण्यतिथि पर शत-शत नमन ।।
विनम्र श्रद्धांजलि
Bpn के सम्पादक सुधीर त्रिपाठी जी के पिता जी की प्रथम पुण्य तिथि पर नमन















