*बुलडोजर के साये में सदियों पुराना इतिहास,*

*ऐतिहासिक मदरसे और एलडीए के बीच सुलगते विवाद की अनकही कहानी,*
*संवाददाता मोहम्मद सैफ साबरी*
लखनऊ। न्याय और सत्य के तराजू पर एक तरफ प्रशासनिक खामोशी का सन्नाटा पसरा है, तो दूसरी तरफ इतिहास, शिक्षा और कानूनी अधिकारों की एक ऐसी मजबूत और अमिट दास्तान सुरक्षित है, जो हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर देने के लिए काफी है। लखनऊ का ऐतिहासिक मदरसा मज़हरुल इस्लाम, दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, और लखनऊ विकास प्राधिकरण, एलडीए के बीच का यह पूरा विवाद महज़ कुछ वर्ग फीट जमीन या ईंट-पत्थरों का संघर्ष भर नहीं है। यह इस बात की जीवंत बानगी है कि किस प्रकार एक लोक कल्याणकारी राज्य में आधुनिक विकास की प्राथमिकताओं और सदियों पुरानी शैक्षणिक विरासत के बीच संतुलन बिछाया जाना चाहिए। जब बुलडोजर और फाइलों की सुगबुगाहट के बीच इतिहास की दीवारें कांपती हैं, तो यह सवाल लाजिमी हो जाता है कि क्या विकास की परिभाषा हमारी तहजीब को मिटाकर लिखी जाएगी?
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि तब तैयार हुई जब एलडीए द्वारा इस प्रतिष्ठित परिसर की भूमि पर अचानक सर्वे की कार्रवाई को आगे बढ़ाया गया। इस पर मदरसा प्रबंधन की ओर से कड़ा एतराज जताते हुए इसे पूरी तरह अनुचित करार दिया गया। प्रबंधन का स्पष्ट और अडिग मत है कि यह भूमि कोई सामान्य व्यावसायिक संपत्ति नहीं, बल्कि नदवा की वह पवित्र ज़मीन है जिस पर पीढ़ियों से मदरसा मज़हरुल इस्लाम का संचालन निर्बाध रूप से होता आ रहा है। प्रबंधन का यह भी पुरजोर आरोप है कि एलडीए के अधिकारियों को इस भूमि से जुड़े विधिक पहलुओं, इसके ऐतिहासिक महत्व और माननीय न्यायालय में पहले से विचाराधीन मुकदमों की सम्पूर्ण जानकारी लिखित रूप में दी जा चुकी थी।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि जब इस संवेदनशील मामले पर पत्रकारों और पक्षकारों द्वारा एलडीए का आधिकारिक पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो महकमे की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। एलडीए के नजूल अधिकारी प्रभाकर सिंह से जब फोन के माध्यम से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने न तो फोन उठाया और न ही कोई जवाब देना मुनासिब समझा। एलडीए की ओर से अब तक कोई भी पुख्ता और स्पष्ट बयान सामने न आना, प्रशासनिक स्तर पर बरती जा रही उस गहरी चुप्पी को दर्शाता है जो कई तरह के गंभीर संदेहों और साजिशों की बू पैदा करती है।
इस बीच, मदरसा परिषद का भी एक बेहद कड़ा और दो टूक बयान सामने आया है। परिषद ने साफ शब्दों में यह स्पष्ट किया है कि इस पूरी जमीन पर पूरी तरह से स्थगन आदेश स्टे लागू है और उनके पास इसका वैध स्टे मौजूद है, क्योंकि इससे जुड़ा मुकदमा अदालत में पहले से ही विचाराधीन है। मदरसा प्रबंधन और परिषद का यह रुख इस अकाट्य सत्य को बल देता है कि जब मामला न्यायपालिका की देहरी पर हो, तो किसी भी प्रकार की एकतरफा प्रशासनिक या दंडात्मक कार्रवाई न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के सरासर खिलाफ है।
जब प्रशासनिक कदमों ने इस विवाद की आंच को खतरनाक हद तक तेज कर दिया, तब न्याय की आस में यह मामला माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय लखनऊ खंडपीठ की चौखट तक जा पहुँचा। न्यायमूर्ति अताउरहमान मसूदी की अदालत में विविध एकल याचिका संख्या 16974 सन् 2021 के अंतर्गत इस प्रकरण की एक-एक परत पूरी पारदर्शिता के साथ खुली।
सुनवाई के दौरान एलडीए की ओर से यह तकनीकी आपत्ति उठाई गई थी कि इस मामले में सीधे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय नहीं है और याची को अधिनियम की धारा 41(3) के तहत पुनरीक्षण में जाना चाहिए था। किंतु, माननीय न्यायालय ने इस संकीर्ण और गोलमोल तकनीकी दलील को सिरे से खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक स्पष्टीकरण दिया कि केवल वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होने मात्र से उच्च न्यायालय के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र और नागरिकों के जीवन व अधिकारों के संरक्षण के अधिकार पर कोई रोक नहीं लग जाती।
इसके साथ ही, अदालत ने इस प्रशासनिक विसंगति पर भी बेहद कड़ा संज्ञान लिया कि पूर्व में सुनवाई आधिकारिक़ तौर पर नज़ूल अधिकारी के स्तर पर हुई थी, किंतु आदेश अचानक उपाध्यक्ष, एलडीए के हस्ताक्षर से पारित कर दिया गया, जिसने इस पूरी प्रशासनिक कार्यप्रणाली की विरोधाभासी और संदिग्घ प्रकृति को बेनकाब कर दिया।
इस पूरे विधिक परिदृश्य का सबसे मानवीय, संवेदनशील और दूरदर्शी पहलू माननीय न्यायालय की वह टिप्पणी रही, जिसमें इतिहास और शिक्षा के महत्व को सर्वोपरि रखा गया। न्यायालय ने अपने आदेश में गहराई से रेखांकित किया कि इस प्रकरण से जुड़ी भू-अभिलेखीय प्रविष्टियां बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दौर की हैं और यहाँ स्वीकृत नक्शे भी अत्यंत प्राचीन हैं।
जिस पावन उद्देश्य यानी राष्ट्र निर्माण और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए इस भवन का उपयोग पीढ़ियों से हो रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए, किसी भी प्रकार की दंडात्मक या ध्वस्तीकरण जैसी विध्वंसकारी कार्रवाई से पहले इस विवाद की तह में जाकर कानून के सख्त और न्यायसंगत मानदंडों पर इसका परीक्षण होना अनिवार्य है।
इसी अकाट्य संवेदनशीलता को सर्वोपरि रखते हुए न्यायालय ने 6 अगस्त 2021 को अत्यंत संतुलित निर्देश पारित करते हुए यह आदेश दिया कि अगली तिथि तक मौके पर पूर्ण रूप से यथास्थिति बनाई रखी जाएगी, जिससे तात्कालिक अन्याय, डर और उत्पीड़न की हर आशंका पर एक झटके में विराम लग गया। साथ ही, अदालत ने प्रतिवादियों को तीन सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा और उसके बाद एक सप्ताह के भीतर प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने का सख्त निर्देश देकर यह स्पष्ट कर दिया कि अब यह लड़ाई महज़ भावनाओं की नहीं, बल्कि अकाट्य साक्ष्यों, पुराने अभिलेखों और दूध का दूध-पानी का पानी करने वाली न्याय की कसौटी पर लड़ी जाएगी।
यह पूरा संघर्ष इस बात की सबसे बड़ी कसौटी है कि सत्य और न्याय की इस अदालत में हर एक शब्द, हर एक पुरानी स्याही और हर एक साक्ष्य का अपना भारी-भरकम वजन होता है। एलडीए अधिकारियों की उस संदिग्घ और पीड़ादायक चुप्पी के बीच मदरसा परिषद और न्यायपालिका का यह मजबूत रुख इस अटूट विश्वास को पुनर्जीवित करता है कि अंधेरे चाहे कितने भी घने क्यों न हों, कानून की देहरी पर हर एक नागरिक और संस्थान के अधिकारों की रक्षा पूरी मुस्तैदी से की जाती है।
आज यह सवाल हर इंसाफपसंद इंसान के जेहन में गूंज रहा है, क्या हमारी विकास गाथाएं इतिहास के पन्नों को रौंदकर लिखी जाएंगी, या फिर न्याय के इस मंदिर में विरासत की लौ यूंही रोशन रहेगी? जवाब आने वाले वक्त के गर्भ में है, लेकिन न्यायपालिका के फैसले ने फिलहाल इस पावन जमीन पर उम्मीद का एक नया सूरज जरूर उगा दिया है।













