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जयंती विशेष : रंगमंच में आशु नाटकों के प्रवर्त्तक थे राजेंद्र रघुवंशी, आलेख शंकर देव तिवारी

जयंती विशेष : रंगमंच में आशु नाटकों के प्रवर्त्तक थे राजेंद्र रघुवंशी

आगरा : रंगमंच क्षेत्र के नाट्य पितामह राजेंद्र रघुवंशी को आशु नाटकों का प्रवर्तक कहा जाता है। उन्होंने अपनी टीम के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या को जानकर तुरंत नाटकों का मंचन किया और ग्रामीणों को समस्याओं के प्रति जागरुक करते हुए उनके निदान के लिए शासन-प्रशासन को सचेत किया था।

 

वे एक श्रेष्ठ साहित्यकार थे। उन्होंने वर्ष 1940 से लेखन की शुरुआत की। ‘राजेंद्र रघुवंशी स्मृति ग्रंथ’, ‘सांस्कृतिक योद्धा की अभिनव यात्रा’ के पृष्ठ 233 के अनुसार हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं, उपन्यास, नाटक, कहानी, कविता, गीत, ग़ज़ल, रिपोर्ताज आदि में वे सिद्धहस्त थे। रघुवंशी ने दो उपन्यासों ‘कड़वे घूँट’ और ‘बिंध गया सो मोती’ की रचना की। 10 पूर्णकालिक नाटक और 80 एकांकी नाटक लिखे। मुंशी प्रेमचंद के चार उपन्यासों गोदान, सेवासदन, प्रेमाश्रम और रंगभूमि तथा उनकी डेढ़ दर्जन कहानियों का नाट्य रूपांतरण किया। वे पहले नाट्य लेखक थे, जिन्होंने मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का नाट्य रुपातंरण किया था। अमृतलाल नागर, कृष्ण चंदर, अमृता प्रीतम, उदयशंकर भट्ट आदि की कृतियों के नाट्य रूपांतर व मंचन किए। 100 से अधिक मंचीय गीतों, नृत्य-नाटिकाओं की प्रस्तुति उनके निर्देशन में हुई।

 

रघुवंशी जी ने फिल्म ‘गर्म हवा’ एवं ‘जमुना किनारे’ में भूमिकाएँ निभाईं और ‘सारा आकाश’ फिल्म में संगीत सहयोग दिया।काव्य के क्षेत्र में उनका विशेष यश था और अनेक ख्याति प्राप्त कवियों के साथ मंच साझा किया था।

 

रंगमंच राजेंद्र रघुवंशी के जीवन में रंगमंच रचा-बसा था। रंगमंच का कोई ऐसा पक्ष नहीं जिस पर उन्होंने अपनी छाप न छोड़ी हो। अभिनय, निर्देशन, लेखन, संगीत, नृत्य, कार्यक्रम प्रस्तोता आदि सभी क्षेत्रों में उन्होंने ख्याति अर्जित की। नाटकों, नृत्य-नाटिकाओं, गीतों और नृत्यों की रचना के साथ-साथ मंच हेतु विभिन्न कला रूपों का लेखन, निर्माण एवं प्रस्तुतिकरण किया।

 

20 अप्रैल 1920 मदन मोहन दरवाजा, निकट नूरी गेट में जन्मे राजेंद्र रघुवंशी का निधन 26 फरवरी 2003 को 83 वर्ष की अवस्था में 30/213, किदवई पार्क,राजामंडी, आगरा पर हो गया था।दिलीप रघुवंशी (सुपुत्र) इप्टा के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव ने बताया कि वर्ष 2002 में कवयित्री रोली तिवारी ने ‘रंगकर्मी राजेंद्र रघुवंशी का लोक रंगमंच में योगदान’ विषय पर डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से शोध किया था। इप्टा के स्थापना वर्ष 1943 से लेकर मृत्यु पूर्व तक वे इप्टा के लिए समर्पित रहे। उन्होंने इप्टा को एक नई दिशा दी। उनके समय में इप्टा का केंद्रीय कार्यालय आगरा में रहा। उस काल को इप्टा का ‘स्वर्णकाल’ कहा जाता है।

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