रियाजुद्दीन को आप जानते हैं कि नहीं । दिल्ली जहाँ की कुछ सभ्रांत जनता मुसलमानों को टाईट रखने के लिए भाजपा के खेमे में बैठकर अपने ही दुकान मकान पर बुलडोजर चलवाकर डांस किया करती है । उसी दिल्ली में एक होटल में आग लगती है। आग से बचने के लिए फंसे लोगो के पास सिर्फ छत से कूदने का ही आप्शन बचता दीखता है ,मगर यह तो मौत को चुनने का तरीका ही था। ऐसे में रियाजुद्दीन जैसे मुल्ले ने यह नहीं सोंचा कि जिन गद्दों को उसे बेचकर कुछ पैसे कमाने हैं। वे गद्दे जो उसकी पूंजी है , हो सकता है वे गद्दे उसने कर्ज से ही लिए हो , उसी टाईट हो चुके मुल्लों की दुनिया के रियाजुद्दीन बिना यह सोंचे कि आग में फंसे लोगों का धर्म क्या है , अपनी पूंजी गद्दों को होटल के बाहर बिछा देता है जिस पर कूद कर लोगों ने अपनी जान बचा ली। अखबारों ने अपने शीर्षक में लिखा। स्थानीय लोगो ने मदद की। जबकि पांचों ही मुसलमान थे । रियाजुद्दीन का नाम लिखने में भी अखबारों को शर्म आने लगी . मगर आप रियाजुद्दीन का आभार प्रकट करने में शर्म न करे. अगर उत्तर खंड में एक मोहम्मद दीपक है तो दिल्ली के पास भी उनका जवाब एक रियाजुद्दीन है ।









