चूनी की रोटी किसने किसने खाई है। शायद आज की पीढ़ी नाम भी पहली बार सुन रही होगी

चूनी की रोटी किसने किसने खाई है। शायद आज की पीढ़ी नाम भी पहली बार सुन रही होगी। क्यों कि जिस चीज से यह रोटी बनती है उत्तर प्रदेश में न के बराबर इसकी खेती होती है।

चूनी की रोटी खाए हुए मुझे ही करीब 20 साल बीत चुके हैं।

जब मेरे घर में अरहर की खेती होती थी तो कई बख़ार केवल अरहर से भरे रहते थे। अरहर के दानों से दाल बनाने के लिए उस समय कोई मशीनें नहीं थी। इस लिए दाल दड़ाई के लिए पत्थर के चकिया का सहारा लिया जाता था। अरहर की दाल

दड़ाई के पहले अरहर को हल्की आंच पर मिट्टी के बर्तन में भुना जाता था। फिर तैयार होती एक सोंधी छिलके वाली दाल।

अब आते हैं चूनी पर यह अरहर दाल के दड़ाई के समय टूटा हुआ सबसे छोटा हिस्सा होता था। जिसे आंखे ( एक तरह का झन्ना, छननी या चलनी) से साबुत दालों से अलग कर लिया जाता था। साबुत अरहर से अलग किए गए इसी टूटन को चूनी कहा जाता था जिसकी बनती एक बढ़िया, लजीज और पौष्टिक रोटी।

चलिए जानते हैं कैसे बनता था झन्ना से झाड़ने पर अरहर की दाल से निकले बारीक टुकड़े यानी चूनी रोटी बनाने के पहले 2 से 3 घंटे के लिए भिगोया जाता है। इसके बाद इसकी अच्छी सी धुलाई होती थी।

भीगे हुए चूनी में इतना गेहूं का आटा मिलाया जाता है जिससे यह रोटी बनाए जाने लायक हो जाए। लेकिन इसे गूंथने के पहले इसमें अच्छी मात्रा में कटा हुआ लहसुन, बारीक कटी प्याज, हरी मिर्च, अगर जरूरत हो तो हींग, हल्की हल्दी और हल्का मसाला मिला कर नमक मिलाते इसके बाद गूंथ कर लोई बनाई जाती। फिर इसे हाथ से या चौका बेलन से गोला आकर देकर लोहे के तवे या कंडे की आग पर पकाया जाता था। जब यह बढ़िया मोटी सी चूनी की रोटी बन कर तैयार होती तो सिरका, चटनी, दाल के साथ खाने का जो आनंद मिलता था उसे शब्दों में बयां नहीं कर पाता हूं। अब अरहर की चूनी से तो नहीं मिलती है लेकिन मैने तय कर लिया या तो खड़ी अरहर या छिलके वाली दाल को मिक्सर/ग्राइंडर में दड़दडा कर लूंगा। इसके बाद 20 साल पहले खाई गई चूनी के रोटी को सिरके, चटनी और अरहर दाल के साथ खाकर आनंद लूंगा।

फोटो साभार–

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