यह नीला कागज़ देखते ही 90s वालों को अपने स्कूल और ऑफिस के दिन याद आ जाते हैं। ये था कार्बन पेपर — उस दौर की सबसे सस्ती और भरोसेमंद “फोटो कॉपी मशीन”। जब ज़ेरॉक्स हर जगह नहीं मिलता था, तब एक ही बार लिखकर कई कॉपियाँ निकालने का यही तरीका था।
स्कूल के फॉर्म भरने हों, आवेदन लिखना हो या किसी ज़रूरी दस्तावेज़ की दूसरी कॉपी बनानी हो, बस बीच में कार्बन पेपर रखो और लिखना शुरू कर दो। लेकिन ज़रा सा हाथ हिल गया तो पूरी कॉपी बिगड़ जाती थी। फिर वही काम दोबारा करना पड़ता था।
इसे संभालकर रखना भी किसी जिम्मेदारी से कम नहीं था। थोड़ा सा मुड़ जाए या दब जाए तो सही प्रिंट नहीं आता था। और अगर गलती से उल्टा रख दिया, तो कागज़ की जगह मेज़ या कॉपी पर ही निशान छप जाते थे। फिर घर में डाँट अलग पड़ती थी।
बचपन में कई शरारती बच्चे इसका इस्तेमाल छोटी-छोटी पर्चियाँ बनाने के लिए भी करते थे। लेकिन कार्बन का नीला रंग अक्सर राज खोल देता था। हाथ, जेब या उंगलियाँ देखकर ही समझ आ जाता था कि कुछ गड़बड़ है।
आज एक क्लिक में कितनी भी कॉपियाँ निकल जाती हैं, लेकिन उस समय कार्बन पेपर से साफ-सुथरी कॉपी निकालने का जो अलग ही मज़ा और संतोष था, वह आज की तकनीक में कहाँ?
बताइए, आपके घर में इसे क्या कहा जाता था — “कार्बन पेपर” या “कॉपी वाला कागज़”? 😄
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