*पत्रकारिता पर ‘जवाबदेही’ या ‘आजादी पर प्रहार’?* *दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी पर मचा घमासान!*
*क्या लोकतंत्र की मजबूती के लिए ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ का गला घोंटना सही है? भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने उठाए तीखे सवाल।*
नई दिल्ली :
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्रकारिता की बदलती प्रकृति पर चिंता जाहिर की है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि प्रेस की आजादी लोकतंत्र की नींव है, लेकिन इसके नाम पर अराजकता स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि आज हर कोई मोबाइल और माइक्रोफोन लेकर खुद को पत्रकार घोषित कर रहा है, जिसके पास न तो कोई प्रशिक्षण है और न ही कोई जवाबदेही। कोर्ट ने सरकार को एक ऐसा ‘नियामक ढांचा’ (Regulatory Framework) बनाने का सुझाव दिया है, जिससे फर्जी, गैर-जिम्मेदाराना और डराने-धमकाने वाली पत्रकारिता पर लगाम लगाई जा सके।
*दिल्ली हाई कोर्ट के बयान के बाद भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी की ‘अग्निशिखा’ जैसी प्रतिक्रिया।*
दिल्ली हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी ने कड़ा विरोध किया है। संगठन के संस्थापक एके बिंदुसार एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बालकृष्ण तिवारी ने संयुक्त रूप से इसे नागरिक पत्रकारिता (Citizen Journalism) और अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है।
*संगठन की प्रमुख आपत्तियाँ:*
डिग्री का दोमुंहा पैमाना: संस्थापक एके बिंदुसार ने जोरदार तर्क दिया कि यदि पत्रकारिता के लिए डिग्री या प्रशिक्षण अनिवार्य है, तो फिर सांसद और विधायक बनने के लिए ‘राजनीति शास्त्र’ की डिग्री क्यों अनिवार्य नहीं है?
लोकतंत्र के लिए खतरा: संगठन का मानना है कि यदि आम नागरिक की आवाज को दबाया गया, तो देश में भ्रष्टाचार पनपेगा और लोकतंत्र फिर से गुलामी की ओर अग्रसर होगा।
मौजूदा कानून पर्याप्त हैं: संगठन का स्पष्ट मत है कि यदि कोई भी—चाहे वह बड़े चैनल का पत्रकार हो या सोशल मीडिया यूजर—अपराध करता है, तो उसके लिए देश में आपराधिक कानून पहले से मौजूद हैं। नए ढांचे के नाम पर पूरी मीडिया जगत को कटघरे में खड़ा करना गलत है।
प्रोत्साहन की जरूरत: सोशल मीडिया के दुरुपयोग को स्वीकार करते हुए संगठन ने मांग की है कि जो यूट्यूबर्स और वेब पोर्टल राष्ट्रहित में कार्य कर रहे हैं, उन्हें चिन्हित कर पुरस्कृत किया जाना चाहिए, न कि उन पर अंकुश लगाया जाए!
यह बहस अब एक बड़े मोड़ पर है। एक ओर न्यायालय है जो व्यवस्था और ‘जवाबदेही’ की बात कर रहा है, तो दूसरी ओर पत्रकारिता जगत है जो ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को अपनी आखिरी ढाल मान रहा है।
संगठन की मांग है कि न्यायपालिका को इस विषय पर पुनर्विचार करना चाहिए। पत्रकारिता पर लगाम कसने के बजाय, उन तत्वों को अलग करना आवश्यक है जो पत्रकारिता की आड़ में अपराध कर रहे हैं, ताकि लोकतंत्र का प्रहरी कहे जाने वाला चौथा स्तंभ अपनी गरिमा और आजादी के साथ बना रहे।
संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बालकृष्ण तिवारी ने कहा कि इस तरह के नियम और कानून लाने से भ्रष्टाचार रुकने वाला नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले लोगों का सम्मान होना चाहिए न की भ्रष्टाचार का खुलासा करने वाले पोर्टल एवं युटयुबर्स पर पाबंदी लगाना कहां का न्याय संगत है।
संगठन के केंद्रीय सलाहकार परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष कृष्ण माधव मिश्रा ने साफ तौर पर कहा कि यह लोकतंत्र को बर्बाद करने वाली नीतियां लाई जा रही है।
संगठन के केंद्रीय अनुशासन समिति के केंद्रीय अध्यक्ष राम आसरे ने कहां की कुछ लोगों को खुली छूट देकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का यह मापदंड तैयार किया जा रहा है उन्होंने बताया कि जब से युटयुबर्स और न्यूज़ पोर्टल सक्रिय हुए तब से कई बड़े से बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है कई राजनेता एवं अधिकारी के ऊपर बड़ी कार्रवाई भी हुई है क्या उन्हें बचाने की यह सोची समझी कोई योजना है।









