इंसानियत की मिसाल बने कोलऊद के सलमान पठान, एक साल से लावारिस शवों को दे रहे कंधा

*मीरजापुर: इंसानियत की मिसाल बने कोलऊद के सलमान पठान, एक साल से लावारिस शवों को दे रहे कंधा।*

 

*नरायनपुर चौकी क्षेत्र में मिलने वाले हर धर्म के लावारिस शवों का अपने खर्च पर करते हैं अंतिम संस्कार, आजीवन सेवा का लिया संकल्प*

*मीरजापुर/अदलहाट, 30 अप्रैल 2026:* थाना अदलहाट अंतर्गत नरायनपुर चौकी क्षेत्र के ग्राम सभा कोलऊद निवासी समाजसेवी सलमान पठान पुत्र मैनुद्दीन खान इंसानियत की ऐसी मिसाल पेश कर रहे हैं जिसकी चारों ओर चर्चा है। नक्श ग्रीन सिटी से जुड़े सलमान पठान पिछले एक साल से भी अधिक समय से लावारिस शवों का ‘बेटा’ बनकर पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार कर रहे हैं।

नरायनपुर चौकी पुलिस को जब भी क्षेत्र में कोई लावारिस शव मिलता है और 72 घंटे की कानूनी प्रक्रिया के बाद भी उसका कोई वारिस सामने नहीं आता, तो पुलिस समाजसेवी सलमान पठान को सूचित करती है। सूचना मिलते ही सलमान अपने निजी खर्च पर शव को पोस्टमार्टम हाउस से श्मशान घाट तक ले जाते हैं। कफन, लकड़ी, पंडित, घी और अन्य सामग्री का पूरा इंतजाम वह खुद करते हैं और हिंदू रीति-रिवाज से दाह संस्कार कराते हैं।

*’धर्म नहीं, बस इंसानियत देखता हूं’:*

सलमान पठान का कहना है, “मेरे लिए मरने वाला सिर्फ एक इंसान है। उसका कोई धर्म नहीं होता। मेरा मजहब इंसानियत है। मैंने यह संकल्प लिया है कि नरायनपुर चौकी क्षेत्र में मिलने वाली किसी भी धर्म की लावारिस लाश का अंतिम संस्कार मैं आजीवन अपने पैसे से कराता रहूंगा। मरने के बाद हर किसी को सम्मान मिलना चाहिए।”

*एक साल में दर्जन भर से ज्यादा संस्कार:*

स्थानीय लोगों और पुलिस सूत्रों के अनुसार, सलमान पठान पिछले एक साल में 15 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। कई बार शव की हालत बहुत खराब होती है, लेकिन सलमान बिना किसी हिचक के इस पुण्य कार्य को करते हैं। नरायनपुर चौकी प्रभारी ने भी उनके इस सेवा भाव की लिखित में सराहना की है।

*समाज के लिए प्रेरणा:*

क्षेत्र के लोगों का कहना है कि जिस दौर में सगे-सम्बंधी भी किनारा कर लेते हैं, उस दौर में सलमान पठान का यह कदम समाज के लिए प्रेरणा है। लोग इन्हें “इंसानियत का फरिश्ता” और “कोलऊद का श्रवण कुमार” कहकर बुला रहे हैं।

*प्रशासन से अपील:*

सलमान पठान ने जिला प्रशासन से अपील की है कि लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए एक स्थायी सरकारी फंड बनाया जाए, ताकि और लोग भी इस नेक काम से जुड़ सकें। फिलहाल वह अकेले ही यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं और हर महीने अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इस सेवा में लगा देते हैं।

 

 

 

 

 

 

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