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विकास की दौड़ या विनाश की ओर कदम? भारत के पर्यावरण पर मंडराता संकट,बृज खंडेलवाल द्वारा 

विश्व पर्यावरण दिवस पांच जून को

Curtain raiser

आगरा तौ गयो!!

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विकास की दौड़ या विनाश की ओर कदम? भारत के पर्यावरण पर मंडराता संकट

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बृज खंडेलवाल द्वारा

3 जून 2026

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क्या हम अपने बच्चों के लिए एक हरा-भरा भारत छोड़ेंगे, या धूल, धुएं और सूखी नदियों का देश?

यह सवाल आज किसी पर्यावरणविद् की चिंता भर नहीं है। यह आगरा की यमुना के किनारे खड़े हर नागरिक का सवाल है। यह हिमालय की गोद में बसे गांवों की चिंता है। यह उन लाखों लोगों का डर है जो हर सर्दी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।

भारत विकास की हाइ स्पीड ट्रेन पर सवार है। नई सड़कें बन रही हैं। मेट्रो दौड़ रही हैं। उद्योग बढ़ रहे हैं। शहर फैल रहे हैं।

लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। जंगल सिकुड़ रहे हैं। नदियां दम तोड़ रही हैं। हवा जहरीली होती जा रही है। प्रकृति की कीमत पर विकास का यह मॉडल कहीं हमें बहुत महंगा न पड़ जाए।

आगरा इसका जीता-जागता उदाहरण है। एक ओर विश्व प्रसिद्ध ताजमहल है, दूसरी ओर सूखती और प्रदूषित यमुना। करोड़ों रुपये के सौंदर्यीकरण प्रोजेक्ट चल रहे हैं, लेकिन नदी का प्रवाह लगातार घट रहा है। नदी में बहता काला पानी और झाग विकास के दावों पर सवाल हैं।

देश भर में वनों की कटाई चिंता का विषय बनी हुई है। पूर्वोत्तर राज्यों, मध्य भारत और पश्चिमी घाटों में बड़ी मात्रा में वन भूमि को सड़क, खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए परिवर्तित किया जा रहा है। शहरों के आसपास के खेत और हरित क्षेत्र तेजी से कंक्रीट के जंगलों में बदल रहे हैं। पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं देते, वे तापमान नियंत्रित करते हैं, भूजल बचाते हैं और जैव विविधता का आधार हैं। जब जंगल कटते हैं तो केवल पेड़ नहीं गिरते, पूरा पारिस्थितिक तंत्र घायल होता है।

वायु प्रदूषण अब मौसमी समस्या नहीं रहा। दिल्ली, आगरा, कानपुर, लखनऊ और अनेक शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में लगातार दिखाई देते हैं। निर्माण स्थलों की धूल, वाहनों का धुआं और उद्योगों से निकलने वाले उत्सर्जन ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। अस्थमा, फेफड़ों के रोग और हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

जल प्रदूषण की तस्वीर और भी भयावह है। गंगा और यमुना जैसी नदियां करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं, लेकिन इनमें हर दिन लाखों लीटर अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट गिराया जा रहा है। आगरा में यमुना कई बार नदी कम और नाला अधिक दिखाई देती है। नदी पुनर्जीवन की योजनाएं बनती हैं, बजट आवंटित होते हैं, लेकिन जमीनी बदलाव अक्सर दिखाई नहीं देता।

शहरों की अव्यवस्थित वृद्धि भी संकट को बढ़ा रही है। हर व्यक्ति निजी वाहन चाहता है। सार्वजनिक परिवहन अब भी अपर्याप्त है। परिणामस्वरूप ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और गर्म होते शहर। कंक्रीट और डामर की बढ़ती परतों ने प्राकृतिक जल निकासी को बाधित कर दिया है। थोड़ी सी बारिश में शहर डूब जाते हैं, जबकि गर्मियों में तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है।

कुछ विकास परियोजनाएं विशेष चिंता पैदा करती हैं। उत्तराखंड में हरिद्वार के निकट प्रस्तावित परमाणु परियोजनाओं को लेकर भूकंपीय जोखिमों और हिमालयी पारिस्थितिकी पर प्रभाव की आशंकाएं व्यक्त की गई हैं। वहीं ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में विशाल वन क्षेत्र की कटाई, समुद्री पारिस्थितिकी और दुर्लभ जीवों के आवासों पर खतरे की चर्चा लगातार हो रही है। सवाल यह नहीं कि विकास हो या नहीं। सवाल यह है कि विकास किस कीमत पर हो।

जलवायु परिवर्तन इस पूरी चुनौती को और जटिल बना रहा है। मानसून का अनिश्चित व्यवहार, लू की बढ़ती घटनाएं, बाढ़ और सूखे का बढ़ता चक्र गरीब और कमजोर वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है। किसान मौसम की मार झेल रहा है। शहर जल संकट का सामना कर रहे हैं।

भारत के पास कानूनों और संस्थाओं की कमी नहीं है। पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी अनेक ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। ताज ट्रेपेजियम जोन में प्रदूषण नियंत्रण से लेकर जल और वायु संरक्षण तक न्यायपालिका ने कई बार हस्तक्षेप किया है। हाल ही में यमुना पुनर्जीवन पर सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता ने भी उम्मीद जगाई है।

लेकिन कानून केवल किताबों में नहीं, जमीन पर दिखने चाहिए। सबसे बड़ी समस्या क्रियान्वयन की है। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टें अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। कई परियोजनाओं को बाद में मंजूरी दे दी जाती है। निगरानी कमजोर है और जवाबदेही सीमित।

समाधान क्या है?

सबसे पहले नियामक संस्थाओं को अधिक स्वतंत्रता और संसाधन दिए जाएं। प्रदूषण की निगरानी रियल टाइम तकनीकों से हो। पर्यावरणीय उल्लंघनों पर भारी आर्थिक दंड और परियोजनाओं को रोकने जैसी कठोर कार्रवाई हो।

दूसरा, विकास को हरित प्रोत्साहन से जोड़ा जाए। नवीकरणीय ऊर्जा, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और परिपत्र अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाले उद्योगों को कर छूट और वित्तीय सहायता मिले। प्रदूषण फैलाने वालों को वास्तविक पर्यावरणीय लागत चुकानी पड़े।

तीसरा, शहरों की योजना नए सिरे से बनाई जाए। पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता मिले। हर नए शहरी विकास में न्यूनतम हरित क्षेत्र अनिवार्य हो। आगरा जैसे शहरों में यमुना के किनारे हरित गलियारे विकसित किए जाएं।

तकनीक भी बड़ी भूमिका निभा सकती है। उपग्रह निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर आधारित प्रदूषण मापन और जीआईएस मैपिंग पर्यावरण प्रबंधन को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी जब उसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति और पारदर्शिता होगी।

अंततः पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। उद्योग, नागरिक समाज, विश्वविद्यालय, स्थानीय समुदाय और आम नागरिक सभी भागीदार हैं। नदी बचाने, पेड़ लगाने और प्रदूषण कम करने की लड़ाई अदालतों या मंत्रालयों में नहीं जीती जाएगी। यह लड़ाई समाज के भीतर लड़ी जाएगी।

भारत के सामने विकल्प स्पष्ट है। एक रास्ता तात्कालिक लाभ और दीर्घकालिक विनाश की ओर जाता है। दूसरा कठिन जरूर है, लेकिन टिकाऊ विकास और पर्यावरणीय संतुलन की ओर ले जाने वाला है।

प्रकृति चेतावनी दे रही है। यमुना की सूखी धारा, हिमालय की खिसकती ढलानें और जहरीली होती हवा यही संदेश दे रही हैं। सवाल यह है कि क्या हम सुन रहे हैं, या फिर बहुत देर होने का इंतजार कर रहे हैं?

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