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साहित्यः अपने समय का इतिहास होता है,बलराम सरस

*साहित्यः अपने समय का इतिहास होता है*।बल

एटा/साहित्य क्लब एटा द्वारा अपने चर्चित कार्यक्रम चाय पर साहित्य की चर्चा -3 के अन्तर्गत साहित्य अपने समय का इतिहास होता है विषय पर संगोष्ठी का आयोजन प्रो. डॉ. केपी सिंह के आवास पर किया गया जिसकी अध्यक्षता आचार्य डॉ. प्रेमीराम मिश्र ने की। संचालन कवि बलराम सरस ने किया.विषय प्रवर्तन करते हुए बलराम सरस ने कहा- इतिहास तारीखों की श्रंखला बनाता है कभी कभी वह राजनैतिक दबाब के सच्चाई को दबा देता है जबकि साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने समय की सच्चाई, संघर्ष तथा सामाजिक स्थितियों को ईमानदारी से व्यक्त करता है इसलिए कह सकते हैं कि साहित्य अपने समय का इतिहास होता है.
विषय पर बोलते हुए पूनम यादव ने कहा- साहित्यकार जो लिखता है वह समाज में घट रही घटनाओं की सच्ची तस्वीर अपने शब्दों से उकेरता है. वह मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है. मैथिली शरण गुप्त की ये पंक्तियाँ – अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी. आँचल में है दूध और आँख में पानी. उस समय की नारी की स्थिति को दर्शाता है. डॉ. ओमश्रृषि भारद्वाज ने कहा- साहित्यकार देश काल परिस्थिति के अनुसार जो सामाजिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक घटनाओं को देखता है वह साहित्य में परिलक्षित होता है तुलसीदास जी ने उत्तरकाण्ड में रामराज की कल्पना देशहित में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप थी।
राम ओतार कर्मयोगी ने कहा- इतिहास निरन्तर लिखी जाने वाली प्रक्रिया है आज का लेखन कल का इतिहास होता है.
कवयित्री व पत्रकार दीप्ति चौहान ने अपनी बात आगे बढाते हुए कहा-
परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. साहित्यकार का दिल पत्थर का नही हो सकता. बाधाओं को पार कर सच्ची घटनाओं को उद्घाटित कर देना ही साहित्यकार का धर्म है.
डॉ. के. पी. सिंह ने विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा- हर साहित्य समाज का आइना नहीं हो सकता. धर्म और राजनीति से प्रेरित साहित्य इतिहास नहीं बन सकता. हार की जीत, परिन्दे, बूढी काकी, गुल्ली डण्डा आदि के दृष्टांत कहाँ हैं. समाज और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं, हर साहित्य इतिहास नहीं बन सकता.अमाँपुर से आये साहित्यकार हरेन्द्र सिंह राजपूत ने अपने उद्बोधन में कहा – इतिहास तटस्ध होकर लिखा हो यह जरूरी नहीं. प्रायः यह राजनीति से प्रेरित होता है लेकिन साहित्यकार सच को सच लिखने की हिम्मत रखता है. वह अपनी रचनाओं में यदि समस्या पर लेखनी चलाता तो रचना के अन्त में उसका समाधान भी देता है.
साहित्यकार वर्तमान के साथ साथ भविष्य भी लिखता है.
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में आचार्य डॉ. प्रेमीराम मिश्र ने कहा- चाय पर साहित्यिक चर्चा एक यादगार परिचर्चा बन रही है. इससे तत्व की प्राप्ति होती है. साहित्यिक विमर्ष एक सराहनीय पहल है.
सामयिक बोध साहित्यकार के मन में अवश्य आता है. निराला जी के समय से यथार्थपरक रचनाओं का सृजन हुआ जो आम आदमी के जन जीवन से लेकर मानवीय सरोकारों से जुडी हैं. आदर्शोन्मुख यथार्थवाद छायावाद में झलकता है. साहित्य में इतिहास का बिम्ब आता है, साहित्यकार युगबोध कराता है.
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति मनीषिणाः।
मनीसीजन वर्तमान काल के साथ व्यवहार करते हैं।
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