अपनी बात
न्याय की प्रक्रिया में मानवाधिकारों की लक्ष्मण रेखा और बुलडोजर की गूंज
शंकर देव तिवारी
कानून का शासन (Rule of Law) किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला होता है। न्याय की प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है कि कोई भी निर्दोष दंडित न हो और अपराधी को सजा न्यायालय के माध्यम से मिले। लेकिन, वर्तमान में प्रदेश की कानून-व्यवस्था और अपराधियों के खिलाफ अपनाई जा रही आक्रामक रणनीतियों पर जिस तरह मानवाधिकारों के हनन के सवाल उठ रहे हैं, वह एक चिंतनीय विषय है।हाल ही में पुलिस मुठभेड़ों के दौरान आरोपियों के पैरों में गोली लगने की घटनाओं ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। अतीत में जब पुलिस आरोपियों को पकड़ती थी, तो बरामद अवैध हथियारों या आबकारी वस्तुओं के आधार पर एक साक्ष्य-आधारित प्रक्रिया के तहत उन्हें जेल भेजा जाता था। अब, मुठभेड़ में घायल होने वाले अधिकांश आरोपियों के पैरों में ही गोली लगने का पैटर्न जनता और कानूनविदों के बीच संदेह पैदा कर रहा है। आलोचकों का मानना है कि ‘कॉपी-बुक स्टाइल’ जैसी दिखने वाली इन कार्यवाहियों से न्यायिक प्रक्रिया दरकिनार हो रही है। न्याय प्रणाली में ‘गोली मारने’ का अधिकार पुलिस को नहीं, बल्कि अदालत को प्राप्त है। यदि पुलिस मौके पर ही सजा देने लगेगी, तो न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों (Natural Justice) को ठेस पहुँचेगी।दूसरा बड़ा विवादित पहलू फरार और शातिर अपराधियों की संपत्ति कुर्क करने के बजाय उन पर ‘बुलडोजर’ चलाने का है। संगठित अपराध पर अंकुश लगाने के लिए अपराधियों की आर्थिक कमर तोड़ना जरूरी है, लेकिन संपत्ति को नष्ट करने (बुलडोजर एक्शन) की यह नीति प्रक्रियात्मक नियमों (Due Process of Law) पर कई प्रश्नचिह्न खड़े करती है। कानून में संपत्ति कुर्क करने और उसे नीलाम कर राज्य के राजस्व या पीड़ितों के मुआवजे में इस्तेमाल करने की स्पष्ट प्रक्रिया है। इसके विपरीत, मौके पर ही मकानों को मलबे में तब्दील कर देना न केवल संपत्ति की बर्बादी है, बल्कि कई बार इसमें सामूहिक सजा का भाव भी झलकता है, जो मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सिद्धांतों के खिलाफ है।न्याय त्वरित होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपराधियों में भय पैदा करने की होती है, लेकिन यह भय संविधान और कानून के दायरे में ही स्वीकार्य हो सकता है। यदि अपराधियों से निपटने के लिए नियमों को ताक पर रखा जाएगा, तो कल को यह परिपाटी आम नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए भी घातक सिद्ध हो सकती है।आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस और प्रशासन अपराध नियंत्रण के अपने प्रयासों में सख्ती बरते, लेकिन अपनी कार्यप्रणाली को पारदर्शी और कानूनी दायरे में रखे। मुठभेड़ों की निष्पक्ष जांच और संपत्तियों की विधिवत नीलामी जैसे कदम ही सरकार की नीयत को पारदर्शी बना सकते हैं। अंततः, दंड प्रक्रिया का उद्देश्य सिर्फ अपराधियों को सबक सिखाना नहीं, बल्कि कानून में आम जनता के अटूट विश्वास को बनाए रखना है।









