“सुपर इंडिया” से “घिरते भारत” तक : शक्ति, स्मृति और सामरिक यथार्थ का अधूरा आख्यान, आलेख शंकर देव तिवारी

“सुपर इंडिया” से “घिरते भारत” तक : शक्ति, स्मृति और सामरिक यथार्थ का अधूरा आख्यान

Oplus_131072

3 अप्रैल 1989 को Time ने अपने मुखपृष्ठ पर “Super India: The Next Military Power” शीर्षक प्रकाशित कर वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती सामरिक उपस्थिति को रेखांकित किया था। यह केवल एक पत्रिका का कवर नहीं था; यह उस समय के भारत की सैन्य-सामरिक महत्वाकांक्षा, राजनीतिक आत्मविश्वास और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में उसकी निर्णायक भूमिका का प्रतीक था।

 

उस दौर में भारत केवल एक विकासशील लोकतंत्र नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में निर्णायक हस्तक्षेप करने वाली शक्ति के रूप में देखा जा रहा था। किंतु आज, लगभग चार दशक बाद, यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है कि क्या वह “सुपर इंडिया” केवल एक क्षणिक सामरिक चमक थी, या भारत वास्तव में एक दीर्घकालिक क्षेत्रीय शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर था? और यदि था, तो फिर वह आत्मविश्वास आज इतना बिखरा हुआ क्यों प्रतीत होता है?

 

## राजीव गांधी का काल : तकनीकी आधुनिकता और सामरिक assertiveness

 

Rajiv Gandhi के कार्यकाल को सामान्यतः कंप्यूटर, दूरसंचार और युवा नेतृत्व के संदर्भ में याद किया जाता है, किंतु उनके शासनकाल का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारत की सैन्य-सामरिक पुनर्संरचना भी था।

 

1980 के दशक के मध्य तक भारत ने यह समझ लिया था कि केवल नैतिक कूटनीति या गुटनिरपेक्षता पर्याप्त नहीं है। चीन और पाकिस्तान की संयुक्त चुनौतियों, शीत युद्ध की बदलती संरचना तथा दक्षिण एशिया में अस्थिरता के बीच भारत को एक “क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता” की भूमिका ग्रहण करनी होगी।

 

## सियाचिन : हिमालय पर इच्छाशक्ति की विजय

 

1984 का Operation Meghdoot भारतीय सैन्य इतिहास का निर्णायक मोड़ था। भारत ने दुनिया के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर रणनीतिक बढ़त स्थापित की।

 

1987 में पाकिस्तानी “कायेद पोस्ट” पर भारतीय सेना की कार्रवाई, जिसमें Bana Singh ने अद्वितीय साहस दिखाया, केवल एक सामरिक सफलता नहीं थी; यह संदेश था कि भारत अब सीमाओं की रक्षा “प्रतिक्रियात्मक” नहीं बल्कि “पूर्व-प्रभावी” रणनीति से करेगा। आज “बाना सिंह पोस्ट” भारतीय सैन्य मनोबल का प्रतीक है।

 

## चीन के साथ टकराव : 1962 की मानसिकता से बाहर आता भारत

 

1986-87 का Sumdorong Chu standoff भारतीय सामरिक इतिहास में अक्सर कम चर्चा का विषय बनता है, जबकि इसका महत्व अत्यंत गहरा था।

 

1962 के युद्ध के बाद पहली बार भारत ने चीन के सामने सैन्य दृढ़ता दिखाई। Operation Chequerboard के अंतर्गत भारतीय सेना ने बड़े पैमाने पर सैनिक तैनाती, एयरलिफ्ट और हाई-ग्राउंड कब्जों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि भारत अब पीछे हटने वाला राष्ट्र नहीं है।

 

इसी काल में अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था; यह चीन को राजनीतिक संदेश था कि भारत अपनी सीमाओं को लेकर किसी अस्पष्टता में नहीं है।

 

यहीं से भारत-चीन संबंधों में “संघर्ष और संवाद” का नया मॉडल उभरा, जिसका प्रभाव आज तक LAC की राजनीति में दिखाई देता है।

 

## श्रीलंका और मालदीव : दक्षिण एशिया में भारत की निर्णायक भूमिका

 

1987 का Indian Peace Keeping Force deployment और 1988 का Operation Cactus भारत की क्षेत्रीय शक्ति-क्षमता के प्रतीक थे।

 

मालदीव में तख्तापलट की कोशिश को भारत ने कुछ घंटों में विफल कर दिया। यह संदेश केवल मालदीव के लिए नहीं था; यह पूरे हिंद महासागर क्षेत्र के लिए था कि भारत अपनी सामरिक परिधि में अस्थिरता को बर्दाश्त नहीं करेगा।

 

हालाँकि श्रीलंका में IPKF अभियान अंततः राजनीतिक और सैन्य विवादों में घिर गया, किंतु इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत अपने पड़ोस में प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका निभाने को तैयार था।

 

## सैन्य आधुनिकीकरण : बोफोर्स से INS विराट तक

 

राजीव गांधी काल में सेना के आधुनिकीकरण पर गंभीर ध्यान दिया गया।

 

* INS Viraat का आगमन,

* परमाणु पनडुब्बी सहयोग,

* आधुनिक संचार प्रणाली,

* नाइट विज़न तकनीक,

* और विशेष रूप से Bofors FH77 तोपों की खरीद,

 

इन सबने भारतीय सेना को नई दिशा दी। विडंबना यह है कि बोफोर्स भारतीय राजनीति में “घोटाले” का पर्याय बन गया, जबकि 1999 के Kargil War में इन्हीं तोपों ने निर्णायक भूमिका निभाई।

 

## क्या वास्तव में भारत “नेक्स्ट मिलिट्री पावर” बन रहा था?

 

यहाँ तथ्यात्मक संतुलन आवश्यक है। 1980 के दशक का भारत आर्थिक रूप से अभी भी सीमित संसाधनों वाला राष्ट्र था। उसकी सैन्य शक्ति प्रभावशाली अवश्य थी, लेकिन वह अमेरिका, सोवियत संघ या चीन जैसी वैश्विक शक्ति नहीं था।

 

Time magazine का कवर एक सामरिक संभावना का संकेत था, न कि अंतिम निष्कर्ष। भारत का प्रभाव मुख्यतः दक्षिण एशिया तक सीमित था। इसके अतिरिक्त:

 

* श्रीलंका में IPKF अभियान अंततः राजनीतिक विफलता माना गया,

* पंजाब और उत्तर-पूर्व की आंतरिक चुनौतियाँ गंभीर थीं,

* अर्थव्यवस्था भुगतान संतुलन संकट की ओर बढ़ रही थी,

* और बोफोर्स विवाद ने राजीव गांधी की राजनीतिक विश्वसनीयता को भारी क्षति पहुँचाई।

 

इसलिए उस दौर को केवल “स्वर्णिम युग” कहना भी इतिहास को सरलीकृत करना होगा।

 

## आज का भारत : शक्ति अधिक, आत्मविश्वास कम?

 

समकालीन भारत की स्थिति विरोधाभासी है। आज भारत की अर्थव्यवस्था 1989 की तुलना में कहीं अधिक बड़ी है। रक्षा बजट विशाल है, अंतरिक्ष कार्यक्रम उन्नत है, डिजिटल क्षमता मजबूत है और वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति भी बढ़ी है।

 

फिर भी यह धारणा क्यों बनती है कि भारत रणनीतिक रूप से “घिर” रहा है? क्योंकि आज का भू-राजनीतिक परिदृश्य कहीं अधिक जटिल है:

 

* चीन केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं; वह हिंद महासागर, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और म्यांमार तक सक्रिय है।

* पाकिस्तान प्रत्यक्ष युद्ध से अधिक “हाइब्रिड रणनीति” अपनाता है।

* अमेरिका और रूस दोनों के साथ भारत के संबंध बहुध्रुवीय संतुलन पर आधारित हैं।

* QUAD और BRICS जैसे मंच अवसर भी हैं और सीमाएँ भी।

 

अर्थात आज शक्ति केवल सैन्य क्षमता का प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी, समुद्री, साइबर और कूटनीतिक समन्वय का प्रश्न है।

 

## “डिवाइडर इन चीफ” बनाम “सुपर इंडिया” : मीडिया और राजनीतिक स्मृति

 

Time magazine ने बाद के वर्षों में भारत पर आलोचनात्मक कवर भी प्रकाशित किए, जिनमें “Divider in Chief” विशेष रूप से चर्चित रहा। यह तुलना केवल दो प्रधानमंत्रियों की नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक धारणा की भी है।

 

1989 का भारत एक उभरती शक्ति के रूप में देखा जा रहा था; आज का भारत एक बड़ी शक्ति तो है, लेकिन उसके भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक विमर्श को लेकर वैश्विक प्रश्न भी उठते हैं।

 

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि किसी राष्ट्र की शक्ति केवल सेना से नहीं मापी जाती। उसकी संस्थाएँ, सामाजिक सामंजस्य, वैज्ञानिक दृष्टि, आर्थिक स्थिरता और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं।

 

## इतिहास का उपयोग, मिथक का नहीं

 

राजीव गांधी काल की सैन्य-सामरिक उपलब्धियाँ वास्तविक थीं और उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। सियाचिन, ऑपरेशन चेकरबोर्ड, ऑपरेशन कैक्टस और सैन्य आधुनिकीकरण भारत की रणनीतिक परिपक्वता के महत्वपूर्ण अध्याय हैं। लेकिन इतिहास को केवल राजनीतिक महिमामंडन या वर्तमान की निराशा के उपकरण के रूप में देखना खतरनाक है।

 

भारत न तो 1989 में पूर्ण “सुपर पावर” था, न आज पूरी तरह असहाय है। वास्तविकता इन दोनों अतियों के बीच स्थित है। राष्ट्र की शक्ति किसी एक नेता, एक कवर स्टोरी या एक सैन्य अभियान से निर्मित नहीं होती। वह निरंतर संस्थागत क्षमता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक एकता और दूरदर्शी कूटनीति से बनती है।

 

आज भारत के सामने चुनौती केवल सीमाओं की रक्षा की नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय दृष्टि को पुनर्जीवित करने की है जिसमें सैन्य शक्ति के साथ लोकतांत्रिक गरिमा, वैज्ञानिक चेतना और क्षेत्रीय विश्वास भी समान रूप से सम्मिलित हों।

Leave a Comment