प्रयागराज से कमल कुमार मिश्रा की खास रिपोर्ट।
*प्रयागराज में जालसाजी एवं भ्रष्टाचार का खुलासा तिरासी बीघा सरकारी पहाड़ का रहस्य और दस्तावेजों की नई परत! एफआईआर के बाद अब वर्ष 1966 से शुरू होगी पूरी जांच*
सिर्फ मुकदमा नहीं, अब रजिस्ट्री, सजरा, खसरा, खतौनी, फांटबंदी, दाखिल- खारिज और राजस्व रिकॉर्ड की पूरी श्रृंखला होगी जांच की कसौटी पर।
हाल ही में उप जिलाधिकारी रहे गणेश कन्नौजिया एवं स्टेनों प्रदीप कुमार संदेश के घेरे में उपरोक्त दोनों लोगों की कार्य प्रणाली एवं आय के स्रोतों की भी जांच कराई जाए मामला अपने आप खुल जाएगा।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक एके बिंदुसार ने पूरे मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखकर उच्च स्तरीय जांच करने की बात कही है।
आइए पार्ट -1 में जालसाजी एवं भ्रष्टाचार के इस प्रकरण के कड़ी को हम बारीकी से समझते हैं।
बारा, प्रयागराज के लालापुर थाना क्षेत्र के गोल्हैया गांव स्थित करीब तिरासी बीघा भूमि को लेकर दर्ज मुकदमे ने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है।
वहीं दूसरी ओर इस प्रकरण में नामित भूमि स्वामियों शंकरलाल पाण्डेय, आनंद कुमार मिश्रा, पूनम मिश्रा तथा उनके परिजनों ने अपने पक्ष में राजस्व अभिलेखों और न्यायालयीय दस्तावेजों की श्रृंखला सार्वजनिक करते हुए दावा किया है कि उन्होंने भूमि का क्रय-विक्रय पूरी वैधानिक प्रक्रिया के तहत किया था। ऐसे में अब जांच की सबसे बड़ी कसौटी केवल एफआईआर नहीं, बल्कि वर्ष 1966 से लेकर वर्तमान तक के पूरे राजस्व इतिहास की निष्पक्ष पड़ताल बन गई है। भूमि स्वामियों के अनुसार संबंधित भूमि का आधार केवल एक रजिस्ट्री नहीं, बल्कि वर्ष 1966 का तत्कालीन उपजिलाधिकारी का आदेश, ऐतिहासिक खसरा-खतौनी, सक्षम प्राधिकारी द्वारा पंजीकृत विक्रय विलेख, सरकारी दाखिल-खारिज, उपजिलाधिकारी न्यायालय से स्वीकृत फांटबंदी तथा नियमित लगान रसीदों जैसी दस्तावेजी कड़ियों पर आधारित है। उनका कहना है कि वर्ष दो हजार तेरह में मूल खातेदारों से भूमि खरीदने से पहले तहसील स्तर पर उपलब्ध राजस्व अभिलेखों का परीक्षण कराया गया और उसके बाद ही विधिक प्रक्रिया के अनुसार रजिस्ट्री संपन्न हुई। बाद में दाखिल-खारिज तथा अन्य राजस्व कार्यवाहियां भी नियमानुसार हुईं। अब इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि जांच एजेंसियां यह मान रही हैं कि भूमि सरकारी प्रकृति की है, तो फिर वर्ष 1966 से लेकर वर्ष दो हजार तेरह और उसके बाद तक उपलब्ध सभी अभिलेखों का वैज्ञानिक और निष्पक्ष परीक्षण भी उतना ही आवश्यक है। यदि पुराने सजरे, खसरा, खतौनी, नक्शे, फांटबंदी, सीमांकन, दाखिल- खारिज और रजिस्ट्री रिकॉर्ड किसी वैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बाद में विवाद की स्थिति किन कारणों से उत्पन्न हुई। इस मामले की निष्पक्ष जांच का अर्थ केवल वर्तमान कब्जे की स्थिति देखना नहीं, बल्कि पूरी दस्तावेजी श्रृंखला को जोड़ना है। यदि किसी स्तर पर सरकारी अभिलेखों में त्रुटि हुई, यदि किसी ने गलत तथ्यों के आधार पर भूमि का हस्तांतरण कराया, यदि किसी दस्तावेज की वैधता पर प्रश्न है या यदि किसी प्रक्रिया में अनियमितता हुई, तो उसकी जिम्मेदारी भी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर तय होनी चाहिए। दूसरी ओर, यदि प्रस्तुत दस्तावेज विधिसम्मत और वैध पाए जाते हैं, तो उनका भी निष्पक्ष परीक्षण होना आवश्यक है। भूमि स्वामियों ने यह भी अपील की है कि पूरे प्रकरण में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पक्षों के दस्तावेजों की समान रूप से जांच की जाए और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि उनके पास दशकों पुराने सरकारी अभिलेख उपलब्ध हैं और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है। अब इस पूरे विवाद की दिशा जांच एजेंसियों द्वारा जुटाए जाने वाले साक्ष्यों पर निर्भर करेगी। असली सवाल यही है कि वर्ष 1966 से लेकर आज तक की पूरी राजस्व समयरेखा क्या कहती है, पुराने सजरे क्या बताते हैं, रजिस्ट्री किन अभिलेखों के आधार पर हुई, फांटबंदी किस आदेश पर हुई और वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड का उनसे क्या संबंध है। इन प्रश्नों के उत्तर ही तय करेंगे कि यह मामला केवल एक एफआईआर तक सीमित है या सरकारी भूमि, राजस्व अभिलेखों और दस्तावेजी प्रक्रिया की व्यापक पड़ताल का विषय बनेगा।
प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी की टीम जांच पड़ताल में लगी हुई हैं ।
बिंदुसार ने कहा कि जल्द ही हम पार्ट -2 में सारे प्रकरण का खुलासा करेंगे।









