जनता से वसूली, कंपनियों को मुनाफा — आखिर किसके लिए है यह सरकार?

जनता से वसूली, कंपनियों को मुनाफा — आखिर किसके लिए है यह सरकार?

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार कम हो रही थीं, तब देशवासियों को पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई उल्लेखनीय राहत नहीं मिली। उस समय केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क और अन्य करों के माध्यम से जनता से भारी वसूली की। आम आदमी उम्मीद कर रहा था कि वैश्विक कीमतों में गिरावट का लाभ उसकी जेब तक पहुंचेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

अब जब कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, तो उसका पूरा बोझ सीधे जनता पर डाल दिया जा रहा है। सवाल यह है कि जब लाभ हुआ तो उसका फायदा जनता को क्यों नहीं मिला, और जब नुकसान हुआ तो उसकी भरपाई जनता से क्यों कराई जा रही है?

देश की जनता कोई एटीएम नहीं है, जिससे सरकार और पेट्रोलियम कंपनियां अपनी सुविधानुसार धन निकालती रहें। यदि मुनाफा कंपनियां और सरकार कमाएं, तो संकट के समय जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी चाहिए। लोकतांत्रिक शासन का अर्थ जनता को राहत देना है, न कि हर परिस्थिति में उसी पर आर्थिक बोझ डालना।

आज महंगे पेट्रोल-डीजल का असर केवल वाहनों तक सीमित नहीं है। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थ, रसोई गैस, कृषि लागत और रोजमर्रा की वस्तुएं भी महंगी हो जाती हैं। इसका सीधा प्रभाव देश के गरीब, किसान, मजदूर, कर्मचारी और मध्यम वर्ग पर पड़ता है।

सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर उसकी प्राथमिकता जनता है या पेट्रोलियम कंपनियों का मुनाफा?

 

— वैभव कुमार त्रिपाठी ‘डबलू’

प्रवक्ता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, नई दिल्ली

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