एनकाउंटर या ‘सत्य’ की हत्या? भरत तिवारी का जाना, लोकतंत्र के माथे पर कलंक! “क्या गांव की बदहाली पर सवाल उठाना अब राजद्रोह है? क्या विकास की भीख मांगना अब मौत का परवाना है?”

एनकाउंटर या ‘सत्य’ की हत्या? भरत तिवारी का जाना, लोकतंत्र के माथे पर कलंक!

“क्या गांव की बदहाली पर सवाल उठाना अब राजद्रोह है?
क्या विकास की भीख मांगना अब मौत का परवाना है?”

भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक एके बिंदुसार की कलम से——-

बिहार के भोजपुर के जवानियां गांव के भरत तिवारी का ‘एनकाउंटर’ सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, यह उस हर उस आवाज का दमन है जो सत्ता की चौखट पर अपना हक मांगती है। आज इस घटना से यह साबित हो गया कि आजाद भारत के हम सभी गुलाम नागरिक हैं।

जब सरकारी फाइलों में गांव की नींव दफन हो जाती है, तो भरत तिवारी जैसे युवा ‘विद्रोह’ का रास्ता चुनते हैं। लेकिन, उन्हें यह नहीं पता था कि जिस लोकतंत्र में वे अपनी बात रखने जा रहे हैं, वहां उनकी आवाज को सुनने के बजाय, उनकी आवाज को ‘हमेशा के लिए खामोश’ कर दिया जाएगा।

पुलिसिया बर्बरता: वर्दी के पीछे छिपा कायरता का खेल भोजपुर पुलिस की कार्यशैली आज एक बड़ा सवालिया निशान है। हजारो लोगों की मौजूदगी में आम नागरिकों पर AK-47 और इंसास तानना—यह पुलिसिंग नहीं, यह ‘तानाशाही’ का नंगा नाच है। यदि भरत तिवारी ‘मानसिक रूप से विक्षिप्त’ थे, तो उन्हें काबू करने के लिए अत्याधुनिक हथियारों की क्या आवश्यकता थी?
यह पूरी घटना एक सोची-समझी पटकथा लगती है। घटना के तीन दिन बाद भी एसपी साहब का मीडिया से दूरी बनाना और सवालों से भागना सीधे तौर पर किसी बड़े ‘षड्यंत्र’ की ओर इशारा करता है।

क्या पुलिस प्रशासन इस बात का इंतजार कर रहा है कि समय बीतने के साथ लोग इसे भूल जाएं? याद रखिए, जब पुलिस अधीक्षक अपराधी का सामना करने के बजाय सवालों से डरने लगे, तो समझ लीजिए कि वर्दी का रसूख अब कानून की हिफाजत के लिए नहीं, बल्कि सत्ता की दलाली के लिए इस्तेमाल हो रहा है।
क्या हम ‘गुलाम’ भारत में जी रहे हैं?

भगत सिंह ने 1929 में असेंबली में बम फेंका था ताकि ‘बहरी सरकार’ सुन सके। भरत तिवारी ने भी वही किया—अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी हताशा जताई। अंतर बस इतना है कि भगत सिंह के दौर में दुश्मन अंग्रेज था, आज दुश्मन ‘अपने ही देश के कुर्सी पर बैठे वे लोग’ हैं, जिन्हें जनता ने अपने प्रतिनिधि के तौर पर चुना था।


आज अगर हम चुप रहे, तो कल यह ‘पुलिस एनकाउंटर’ एक परंपरा बन जाएगी। जो भी भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ उंगली उठाएगा, उसे एनकाउंटर की भेंट चढ़ा दिया जाएगा। **क्या संविधान ने हमें लूट की खुली छूट इसलिए दी थी कि जब हम अपना हक मांगें, तो हमें मौत मिले?

पत्रकार और समाज के प्रहरियों के लिए एक हुंकार,
मेरे पत्रकार साथियों और सामाजिक योद्धाओं, अब कलम उठाने का समय नहीं, अब आवाज बुलंद करने का समय है।

डर को उखाड़ फेंकें: पत्रकारिता का काम सत्ता का गुणगान करना नहीं, बल्कि उसकी जड़ों में लगे भ्रष्टाचार को उखाड़ना है।

दबाव बनाएं: सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक, जब तक इस मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) न हो, हमें चैन से नहीं बैठना है।
इतिहास साक्षी है: इतिहास कायरों को याद नहीं रखता, इतिहास उन लोगों को याद रखता है जो अंधेरे के खिलाफ दीया जलाने की हिम्मत रखते हैं।

शासन-प्रशासन के नाम चेतावनी..

बिहार और केंद्र सरकार को यह जान लेना चाहिए कि भरत तिवारी की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। जिस भोजपुर की धरती से यह आवाज उठी है, वह अब पूरे देश की आवाज बनेगी। अगर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर उतरेगा और वह आक्रोश किसी भी सत्ता को हिलाने में सक्षम है।

अंतिम शब्द:
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना अपराध नहीं है, यह धर्म है। भरत तिवारी को हम एक विद्रोही के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘क्रांतिकारी शहीद’ के रूप में याद रखेंगे जिसने अपनी जान देकर व्यवस्था का असली चेहरा बेनकाब कर दिया।
“आपकी खामोशी भ्रष्टाचार की ताकत है, और आपकी आवाज उस ताकत की मौत। लिखते रहिए, बोलते रहिए, क्योंकि सच की एक चिंगारी ही जंगल की आग बन सकती है।”

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