*ई-रजिस्ट्री प्रणाली के विरोध में अधिवक्ताओं का प्रदर्शन, कई स्थानों पर निबंधन कार्यालयों में कार्य प्रभावित*
एटा
उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों, जिनमें एटा, अलीगढ़, बागपत, मवाना, ग्रेटर नोएडा एवं मुरादाबाद शामिल हैं, में ई-रजिस्ट्री प्रणाली के विरोध को लेकर अधिवक्ताओं द्वारा प्रदर्शन किए जाने की सूचना प्राप्त हुई है। कई स्थानों पर निबंधन एवं उपनिबंधक कार्यालयों में कार्य प्रभावित होने से बैनामा, पावर ऑफ अटॉर्नी, वसीयत एवं अन्य दस्तावेजों के पंजीकरण के लिए पहुंचे नागरिकों को असुविधा का सामना करना पड़ा।
अधिवक्ताओं का कहना है कि प्रस्तावित ई-रजिस्ट्री व्यवस्था से ग्रामीण एवं तकनीकी रूप से कम सक्षम नागरिकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है तथा तहसील स्तर पर उपलब्ध कानूनी सेवाओं पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है। वहीं राज्य सरकार का पक्ष है कि ई-रजिस्ट्री प्रणाली से पारदर्शिता बढ़ेगी, दस्तावेजों का डिजिटल सत्यापन सुदृढ़ होगा तथा प्रक्रियाओं में तेजी आएगी।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने Harish Uppal vs Union of India सहित विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि अधिवक्ताओं द्वारा न्यायिक कार्यों के बहिष्कार या हड़ताल को सामान्यतः वैध अधिकार नहीं माना गया है। न्यायालय ने कहा है कि न्यायिक एवं सार्वजनिक सेवाओं में अनावश्यक व्यवधान से आम नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
यदि किसी स्थान पर सरकारी कार्यालयों में ताला लगाकर कार्य बाधित किया गया है, तो ऐसी घटनाओं की जांच संबंधित प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों द्वारा की जा सकती है। तथ्यों की पुष्टि के बाद ही किसी व्यक्ति या समूह की जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकती है।
प्रदर्शन के कारण अनेक नागरिकों के संपत्ति संबंधी लेन-देन प्रभावित होने तथा सरकारी राजस्व संग्रह पर असर पड़ने की भी चर्चा है। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक आंकड़े संबंधित विभागों द्वारा जारी किए जाने शेष हैं।
प्रशासनिक अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा नागरिक सेवाओं को सुचारु रूप से संचालित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। वहीं अधिवक्ताओं के संगठनों और सरकार के बीच संवाद के माध्यम से समाधान खोजने की अपेक्षा व्यक्त की जा रही है।
ई-रजिस्ट्री को लेकर चल रहा विवाद प्रशासनिक सुधारों और पारंपरिक व्यवस्था के बीच संतुलन का विषय बन गया है। किसी भी पक्ष का विरोध या समर्थन संवैधानिक एवं कानूनी दायरे में रहकर होना चाहिए, ताकि आम नागरिकों के अधिकार और सार्वजनिक सेवाएं प्रभावित न हों।
*कानूनी दृष्टि से:* यदि वास्तव में किसी सरकारी निबंधन/उपनिबंधक कार्यालय में जबरन ताला लगाकर कार्य रोका गया है, तो यह केवल “हड़ताल” का मामला नहीं बल्कि सरकारी कार्य में बाधा, लोक सेवाओं के अवरोध और कानून-व्यवस्था से जुड़ा विषय बन सकता है। वहीं केवल शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, बशर्ते उससे सरकारी कार्य बाधित न हो। इसलिए किसी घटना की वैधता उसके वास्तविक तथ्यों पर निर्भर करेगी।
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