अपनी बात
लोकतंत्र या ‘गृह-कैद’ का सर्कस: एक व्यंग्य आलेख: शंकर देव तिवारी

लोकतंत्र की परिभाषा शायद अब किताबों तक ही सिमट कर रह गई है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में, जहाँ विकास के दावों के साथ ‘सबका साथ’ का नारा गूंजता है, वहीं जनता के नुमाइंदों—खासकर विपक्ष के सांसदो—के लिए एक नया नियम गढ़ लिया गया है। नियम यह है: “जनता की आवाज बनो, लेकिन अपने घर की चारदीवारी के अंदर!”मजबूत सरकार या कमजोर प्रशासन?जब भी कोई सांसद या राजनीतिक दल किसी उत्पीड़ित परिवार की पीड़ा सुनने, किसी अन्याय के खिलाफ धरना देने या सच्चाई का सचित्र सच जानने के लिए बाहर कदम बढ़ाता है, तो सत्ता के गलियारों में मानो भूकंप आ जाता है। आनन-फानन में पुलिस प्रशासन की फौज सांसद जी के घर के बाहर ऐसे तैनात हो जाती है, जैसे देश की सीमा पर कोई मोर्चा संभालना हो।यह कार्रवाई सीधे तौर पर यह संदेश देती है कि प्रशासन को सच से ज्यादा ‘अफवाहों’ से डर लगता है। लेकिन सवाल यह उठता है—आखिर एक चुने हुए जन-प्रतिनिधि को अपने घर में कैद करके सरकार क्या साबित करना चाहती है? क्या सत्ता इतनी कमजोर है कि एक सांसद की मौजूदगी से हिल जाएगी? या फिर सच का सामना करने की हिम्मत सरकार ने खो दी है?संविधान क्या कहता है?हमारा संविधान अनुच्छेद \(19(1)(a)\) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की आजादी देता है, और अनुच्छेद \(19(1)(b)\) के तहत शांतिपूर्ण तरीके से एकत्रित होने व कहीं भी आने-जाने का मौलिक अधिकार देता है।लेकिन लोकतंत्र के इस नए युग में संविधान की मूल भावना को ताक पर रख दिया जाता है। जब पुलिस का पहरा संविधान को पन्नों में कैद कर देता है, तो सवाल उठता है कि क्या यह देश केवल कागजों पर ही लोकतांत्रिक है? जब सांसद संजय सिंह या रामजीलाल सुमन जैसे नेताओं को पीड़ितों से वार्ता तक नहीं करने दी जाती और उनकी आवाज को डराकर या बलपूर्वक दबाने का प्रयास किया जाता है, तो यह किसी आपातकाल से कम नहीं लगता।न डर सरकार का, न कमजोरी विपक्ष की…ऐसी घटनाओं से अगर किसी की कमजोरी उजागर होती है, तो वह है सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी सहिष्णुता की। जब एक सत्ताधारी दल के पास विपक्ष को तर्कों, विकास और जनहित के मुद्दों से हराने के बजाय ‘हाउस अरेस्ट’ और ‘नजरबंदी’ का हथियार रह जाए, तो इसे सरकार की मजबूती नहीं, बल्कि उसकी घबराहट और असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।जनता सब देखती है। एक सांसद को घर में कैद करने से भले ही कुछ समय के लिए सड़कों पर सन्नाटा पसर जाए, लेकिन दिलों में पनप रहे असंतोष और सत्ता की इस कमजोरी को कोई ‘हाउस अरेस्ट’ कभी नहीं मिटा सकता।









