**मंत्री कार्यालय से गोपनीय पत्र लीक – जनता को गुमराह करने की बड़ी साजिश! आशीष गोयल की नीति से प्रदेश के बिजली उपभोक्ता में त्राहि-त्राहि**
लखनऊ – *उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के साथ दोहरा खेल चल रहा है। गर्मी में जनता पहले से परेशान है*। *उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने जून के बिल में दस प्रतिशत ईंधन और विद्युत क्रय समायोजन अधिभार थोपने का आदेश जारी किया*। *विरोध के बाद अस्थायी राहत दी गई, लेकिन उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने निगम प्रबंध निदेशक को फिर नोटिस जारी कर उन्नीस जून तक जवाब माँगा है*।
**अब तक का सबसे बड़ा रहस्यमय सवाल – मंत्री अरविंद कुमार शर्मा का गोपनीय पत्र जानबूझकर लीक क्यों हुआ?**
*ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने ईंधन और विद्युत क्रय समायोजन अधिभार पर नाराजगी जताते हुए पत्र लिखा*। *लेकिन आज के डिजिटल युग में छोटे मोटे स्थानांतरण भी ईमेल से किए जाते हैं। फिर मंत्री कार्यालय से महत्वपूर्ण गोपनीय पत्र लीक होना बड़ी बात है। इसमें सुरक्षा की भारी चूक है या जानबूझ कर की गई साजिश?* *वैसे मंत्री का पत्र डिजिटल माध्यम से भेजा जा सकता था, लेकिन भौतिक पत्र भेजकर और उसे लीक होने दिया गया। इससे लगता है कि जनता के बीच अपनी छवि बचाने और आशीष गोयल की छवि बिगाड़ने का खेल खेला गया।* *यदि गोपनीय पत्र इस तरह लीक होते रहेंगे तो कल मुख्यमंत्री कार्यालय या राजभवन से भी लीक हो सकता है। यह बड़ा सुरक्षा दोष है। क्या कोई कर्मचारी पैसे के लालच में खरीदा गया? उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार की आशंका मजबूत है*। उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय राजनेताओं में पूर्व में ऐसा कोई भी कद्दावर नेता ऐसा ताकतवर नही मंत्री बना । उ उत्तर प्रदेश के इतिहास में ऐसा कोई कैबिनेट मंत्री नहीं दिखा जो इतने महत्वपूर्ण दो विभाग एक साथ संभाल सके। बड़े-बड़े राजनीतिक आए, लेकिन वे या तो नगर विकास तक सीमित रहे या ऊर्जा में रहे। उत्तर प्रदेश की राजनीति और उत्तर प्रदेश सरकार के इतिहास में यह पहला मंत्री है, जिसके हाथ में इतने महत्वपूर्ण दो विभाग हैं। दोनों ही विभागों में भ्रष्टाचार चरम पर है। दोनों ही विभागों में भ्रष्टाचारी अधिकारियों का बोलबाला है। क्या इसको मंत्री का वरदहस्त प्राप्त या आशीर्वाद प्राप्त अधिकारी कहेंगे? जो मंत्री जी के आशीर्वाद के बिना तो संभालना संभव नहीं है।
*उत्तर प्रदेश के ऊर्जा विभाग में पहले उच्च न्यायालय फिर उच्चतम न्यायालय के आदेशों की खुली अवहेलना हो रही है माननीय उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश विद्युत निगम लिमिटेड के लिए स्थायी स्थानांतरण नीति बना दी है। कोई भी स्थानांतरण होगा तो उसके लिए उच्च स्तरीय दो सदस्यीय समिति यानी हाई पावर समिति का अनुमोदन लेना आवश्यक होगा। फिर भी उत्तर प्रदेश विद्युत निगम लिमिटेड उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाई गई अपनी स्थानांतरण नीति को कैसे अपना सकता है? यहाँ भारतीय प्रशासनिक सेवा की मनमानी साफ दिख रही है। पहले उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना हो रही थी, अब माननीय उच्चतम न्यायालय की। यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी खुद को तानाशाह घोषित कर चुके हैं।*
*क्या दो बड़का बाबुओं की साठ गांठ और जनता को दिखाने के लिए नूरा कुश्ती**
एक पूर्व बड़का बाबू समय से पहले सेवा निवृत्त होकर मंत्री बने और दूसरा वर्तमान बड़का बाबू। बाहर मतभेद का ड्रामा, अंदर पूरी मिलीभगत।
*आशीष गोयल का दोहरा खेल गोयल उच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुए दो पद संभाल रहे हैं*। *मंत्री की मर्जी के बिना यह कैसे संभव? साफ है – मंत्री का वरदहस्त गोयल पर है जिसका सबूत है*।
*माननीय उच्च और सर्वोच्च न्यायालय की अवेहलना मामले में मंत्री की रहस्यमय चुप्पी क्यों ?*
*अमेरिकी ब्लैकलिस्टेड कंपनी के निजीकरण टेंडर पर मंत्री ने विरोध क्यों नहीं किया?*
*छंटनी का विरोध करने वाले भवानी सिंह खंगारौत को मध्यांचल प्रबंध निदेशक पद से हटाकर अपनी चहेती रिया केजरीवाल को बिठा दिया गया जिसकी वजह से प्रबंध और संविदाकर्मियों के बीच हुआ समझौता आज तक लागू नहीं हुआ।*
*मंत्री जी के द्वारा विधानसभा में की निजीकरण की वकालत की गयी। मंत्री जी ने खुद निजीकरण को अच्छा बताया और उसकी वकालत की है।* *इसी आधार पर साफ है कि आशीष गोयल और मंत्री जी दोनों मिलकर जनता को बेवकूफ बने की कोशिश कर रहे हैं।*
*गोयल की साजिश – जनता को त्राहि त्राहि कराकर निजीकरण थोपना*
*गोयल जब से अध्यक्ष बने, निजीकरण तेज। पच्चीस हजार संविदा कर्मियों को हटा दिया। विद्युत व्यवस्था चरमरा गई, दुर्घटनाएँ बढ़ीं। जनता तंग होकर खुद बोलेगी – निजी कर दो।*
*जनता पर दोहरा बोझ डाला जा रहा है ईंधन और विद्युत क्रय समायोजन अधिभार का पुराना बोझ, पच्चीस हजार बेरोजगार, बढ़ती द्रुधटनाएँ समझौते लागू न करना, गर्मी में जानबूझकर तंग करना यह सब साबित करता है कि मंत्री जी और चेयरमैन के बीच नूरा कुश्ती का खेल चालू है सारा खेल निजीकरण की तरफ ही जाता लग रहा है*
*आखिर संयुक्त संघर्ष समिति और संविदा कर्मी यो से हुए समझौते लागू क्यों नहीं किए जा रहे हैं ? गोयल को दो पद क्यों?* *ब्लैकलिस्टेड कंपनी पर चुप्पी क्यों? भवानी सिंह को हटाकर रिया केजरीवाल को क्यों?* *पच्चीस हजार कर्मी हटाकर व्यवस्था क्यों बिगाड़ी?* *निजीकरण की वकालत क्यों? उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवहेलना क्यों?* खैर
**युद्ध अभी शेष है**
**अविजित आनंद**
**संपादक**
**चन्द्रशेखर सिंह**
**प्रबंध संपादक**
**समय का उपभोक्ता**
**राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र, लखनऊ**









